छठी पहेली: वेदों की विषय-सामग्री : क्या वे कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक मूल्य रखते हैं? - Page 48

छठी पहेली

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(जब तक जीवन है तो सुख से क्यों न रहें? क्यों न ऋण लेकर भी घी पिए?)

यदि मरणोपरांत देह भस्म बन जाती है तो वापस कैसे आ सकती है?

देह त्याग के पश्चात् कोई यदि परलोक चला जाता है तो वह अपने परिजन के मोह में फंसकर लौट क्यों नहीं आता?

इस प्रकार यह सब कमाई के धंधे हैं जो ब्राह्मणों ने बना रखे हैं।

यह सभी संस्कार मृतकों के लिए हैं, अन्यत्र कोई फल नहीं मिलता, तीन वेदों के सृष्टा विदूषक, लालबुझक्कड़ और दुरात्मा हैं।

पंडितों, झारपड़ी, तुरपड़ी के सर्वविदित सूत्र और देवी के लिए परोक्ष पूजा सभी अश्वमेध की प्रशंसा में हैं।

इनका अन्वेषण लालबुझक्कड़ों ने किया और इसी कारण पुरोहितों को विभिन्न प्रकार से चढ़ावा दिया जाता है।

जबकि इसी प्रकार निशाचरों ने मांस भक्षण की प्रशंसा की है।’’

यदि चार्वाक और बृहस्पति के मत अमान्य हैं तो अन्य अनेक साक्ष्य विद्यमान हैं। यह साक्ष्य न्यायवैशेषिक, पूर्व और उत्तर मीमांसा दर्शनशास्त्रों में उपलब्ध हैं।

यह स्पष्ट है कि कुटिल लेखकों ने इन दर्शनशास्त्रों पर इकतरफा पाठ्य पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने वेदों की प्रामाणिकता का औचित्य बताने से पूर्व इस बात का पूरा षडयंत्र रचा है कि वेदों की सत्ता को चुनौती देने वाले उनके विरोधियों का मत उनकी पाठ्य पुस्तकों के पास भी न फटक सके। इस तथ्य से हम दो बातें प्रामाणित कर सकते हैंः (1) कि एक ऐसी विचारधारा थी जो वेदों को प्रामाणिक ग्रंथ स्वीकार करने के विरुद्ध थी, (2) कि वे सम्मानित विद्वान थे जिनके मत को वेदों की सत्ता स्वीकार करने वाले भी मानने को बाध्य थे। मैं न्याय और पूर्व मीमांसा में विमत को उद्धृत करता हूँ।

न्यायदर्शन के प्रणेता गौतम वेदों की प्रामाणिकता के पक्षधर थे। उन्होंने सूत्र 57 में अपने विरोधियों के तर्क का सारांश दिया है जो निम्नांकित ख्1, हैः

‘‘वेद प्रमाण नहीं है क्योंकि इनमें ‘‘मिथ्यावाद, आत्मविरोध और पुनरुक्ति दोष है। मौखिक साक्ष्य जो प्रत्यक्ष साक्ष्यों से भिन्न है कि वेद प्रमाण नहीं है, क्यों? क्योंकि

  1. मयूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 113