छठी पहेली: वेदों की विषय-सामग्री : क्या वे कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक मूल्य रखते हैं? - Page 49

34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उसमें मिथ्यापन आदि के दोष हैं।’’

‘‘इन दोषों के संदर्भ में मिथ्यावाद इस तथ्य से प्रमाणित है कि कई बार हम

पाते हैं कि पुत्रेष्टि के लिए दी गई बलि फलदायी नहीं होती और इसी प्रकार

अन्तर्विरोध प्रकट है कि पूर्व और परवर्ती घोषणाओं में भिन्नता है। इस प्रकार वेद

कहता है कि ‘‘वह तब यज्ञ करता है जब सूर्योदय होता है।’’ वह सूर्योदय से

पूर्व यज्ञ करता है। वह तब यज्ञ करता है जब श्यान उसका चढ़ावा लेकर भाग

जाता है और दोनों ही बलिदाता का चढ़ावा उठाकर ले जाते हैं, फिर शब्दों के

बीच अनतर्विरोध है जिनमें बलि की प्रेरणा है और उसकी निंदा भी है जिसके

घातक परिणाम होते हैं। तब पुनरुक्ति के कारण वे प्रमाण नहीं है क्योंकि जो

पहले कहा गया है उसकी तीसरी बार आवृति होती है। अंत में भी पहली बात

दोहराई जाती है। क्योंकि आदि, अंत के समान है और शब्दों की तीसरी आवृति

है। यह वाक्य पुनरुक्ति है। क्योंकि इस वाक्य विशेष में इन उदाहरणों के अनुसार

एक-सा कथन होने के कारण और यह सभी रचनाएं एक व्यक्ति की हैं इसलिए

समान प्रकृति की हैं और उनमें कोई प्रामाणिकता नहीं है।’’

जैमिनि का संदर्भ देखें। वह वेद विरोधियों के विचारों ख्1, को पूर्व मीमांसा के सूत्र 28 और 32 में सार-संक्षेप में उद्धृत करते हैं। सूत्र 28 कहता हैः

‘‘यह भी आपत्ति की गई है कि वेद सनातन नहीं हो सकते, क्योंकि हम पाते

हैं कि उनमें ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख है जो सनातन नहीं है बल्कि जन्म और

मृत्यु के पात्र हैं। इस प्रकार वेद में कहा गया है ‘‘बाबरा प्रवाहनी की इच्छा है,

कुसरविंदा औद्दालकी की इच्छा है’’ इसलए वेद के संदर्भित वाक्यों में इन व्यक्तियों

के जन्म-पूर्व उल्लेख संभव नहीं है। यह स्पष्ट है कि ये वाक्य आरंभिक हैं। इस

प्रकार सनातन नहीं है। यह प्रमाणित है कि ये मानव कृतियां हैं।’’

सूत्र 32 कहता ख्2, हैः

‘‘यह प्रश्न किया गया है कि वेद कर्त्तव्यों का साक्ष्य कैसे हो सकते हैं जबकि उनमें ऐसी असंगत और अनर्गल बातें भरी पड़ी हैं जैसे ‘‘कम्बल और खड़ाऊं पहने एक बूढ़ा द्वार पर खड़ा है और आशीष के गीत गा रहा है। समर्पण को तत्पर एक ब्राह्मणी कहती है ‘‘हे राजन बता, प्रतिपदा के दिन संभोग के क्या अर्थ हैं? अथवा यह ‘‘गऊओं ने इस बलि पर उत्सव मनाया’’।

निरुक्त के लेखक यास्क ने भी यह मत प्रकट किया है। वह कहता हैः

  1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 7

  2. वही, पृ. 80