छठी पहेली: वेदों की विषय-सामग्री : क्या वे कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक मूल्य रखते हैं? - Page 50

छठी पहेली

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पूर्वोक्त खंड में चार प्रकार की ऋचाएं हैं। क. जो देवता की अनुपस्थिति

में संबोधित हैं, ख. जिसमें उसको समक्ष जानकर संबोधन कया गया है,

ग. जिनमें आराधक को उपस्थित और आराध्य को अनुपस्थित माना गया है। ये

अत्यधिक हैं, घ. जबकि जो स्वगत हैं ये यत्र-तत्र ही हैं। ऐसा भी हुआ है कि

देवता की प्रशंसा बिना वरदान की कामना की गई है जैसे कि मंत्र (ऋ. वे.

1.32) ‘‘मैं इन्द्र के शौर्य का वर्णन करता हूं’’ आदि। फिर बिना स्तुति किए

वरदान की कामना की गई है। जैसे ‘‘मैं अपने चक्षुओं से अच्छा देखूं, मेरा मुख

कांतिमान हो और कानों से भली भांति सुनूं। ऐसा अथर्ववेद (यजुर) और बलि

सूत्रों में बार-बार कहा गया है। फिर इसमें हम शपथ और शाप भी पाते हैं।

(ऋ.वे. 7, 104, 15) ‘‘यदि मैं यातुधानी हूं तो आज मैं मर जाऊं’’ (आदि)

फिर हम पाते हैं कुछ विशिष्ट परिस्थितियों को दर्शाने वाले मंत्र (ऋ.वे. 10, 29,

2) सत मृत्यु नहीं थी न अमरत्व आदि कुछ स्थितियों में विलाप भी लक्षित है

जैसे कि मंत्र (ऋ.वे. 10, 95, 14) ‘‘रूपदान देवता लुप्त हो जाएगा और कभी

नहीं लौटेगा’’ आदि। कहीं लांछन और प्रशंसा भी है जैसा कि (ऋ.वे. 10, 117,

6) ‘‘वह व्यक्ति जो अकेला खाता, अकेला पापकर्म करता है आदि। ऐसे ही

द्यूत के विषय में मंत्र हैं (ऋ.वे. 10, 34, 13) द्यूत क्रीड़ार की निंदा की गई

है- और कृषि कार्य की प्रशंसा। इस प्रकार जिन उद्देश्यों से ऋचाओं की सृष्टि

हुई, ये विविध प्रकार के हैं।’’

यास्क के शब्दों मेंः

‘‘प्रत्येक मंत्र किसी देवता के लिए रचा गया है जिससे ऋषि का उद्देश्य इच्छा पूर्ति का है, वह उसे संबोधित करता है।’’

यदि वह प्रमाणित करने के लिए इतना भी पर्याप्त नहीं है कि वेदों में कोई नैतिक अथवा आध्यात्मिक मूल्य नहीं है तो अन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

जहां तक नैतिकता का प्रश्न है, ऋग्वेद में प्रायः कुछ है ही नहीं, न ऋग्वेद नैतिकता का ही आदर्श प्रस्तुत करता है। इस संबंध में तीन उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

पहला यम-यमी संवाद है जो भाई-बहन थे।

‘‘(यमी कहती है)

मैं अपने मित्र (यम) को मित्रता के लिए निमंत्रित करती हूं। विशाल रेगिस्तान और महासागरों को पार करती हुई आई हूं, इस निर्जन भूमि पर (तुम्हारी) संतान जन्म दे, जो तुम्हारे जैसे पिता के महान गुणों से सम्पन्न हो।’’