52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
क्यों वंचित किया गया। जिस समय यह भेद किया गया, तब ये इतने आरंभिक और अविकसित थे कि उन्हें शायद ब्राह्मणों में सम्मिलित कर लिया गया। साथ ही यह बात भी समझ में आती है कि आरण्यकों का श्रुति के अंग के रूप में उल्लेख करना अनावश्यक था कि ये श्रुति का अंग है। उपनिषद् और सूत्रों का प्रश्न एक पहेली बना हुआ है। इन्हें श्रुति से अलग क्यों रखा गया? उपनिषदों के प्रश्न पर एक अन्य अध्याय में अलग से विचार किया गया है। यहां तो सूत्रों के बारे में विचार करना है क्योंकि सूत्रों को समाहित न करने का पार पाना कठिन है। यदि यह बात तर्कसम्मत है कि ब्राह्मणों को श्रुति में सम्मिलित किया जाना चाहिए तो उसी कसौटी पर यह बात खरी नहीं उतरती कि सूत्रों को शामिल क्यों न किया जाए, जैसा कि प्रोफेसर मैक्समूलर कहते हैंः
‘‘हम इस बात को समझ सकते हैं कि किस प्रकार कोई देश अपनी राष्ट्रीय
काव्य रचना का श्रेय किसी अलौकिक पुरुष को दे सकता है। विशेष रूप से
तब जब कि उस काव्य में देवों को संबोधित प्रार्थनाएं और मंत्र समाविष्ट हों।
परन्तु ब्राह्मण ग्रंथों के गद्य-साहित्य के विषय में यह कहना कठिन है। ब्राह्मण
ग्रंथ स्पष्ट रूप से मंत्रों की अपेक्षा बाद की रचनाएं हैं। इसी कारण इन्हें श्रुति में
समाहित किया गया होगा कि इनकी सामग्री ब्रह्म-ज्ञान से मुक्त है और उनकी
विषय-सामग्री साधारण और प्राचीन मंत्र नहीं है। ब्राह्मण ग्रंथों के अधिकांश
दावों के बारे में यह कल्पना की गई होगी कि इनकी रचना ईश्वरीय है जिनका
उद्गम सामान्य रहा अथवा मंत्र नहीं हो सकते। किन्तु हमें इस तर्क को मान्यता
देने की आवश्यकता नहीं, जिसके कारण ब्राह्मण ग्रंथों ने अपने को मंत्र रख्ना के
समकालीन बताया है। इसका कोई कारण समझ में नहीं आता कि जब ब्राह्मण
ग्रंथों और मंत्रों का रचनाकाल अधिक प्राचीन है तो हम इस सहज विचार को
क्यों अस्वीकार कर दें कि यदि सूत्रों और भारत के लौकिक साहित्य की तुलना
की जाए तो उनका महत्व समान बनता है। ऐसी घटना सामान्य है, जहां पवित्र
ग्रंथों का यह नियम है कि बाद की रचनाओं को प्राचीन रचनाओं से ही जोड़ दिया
जाता है जैसा कि ब्राह्मण ग्रंथों के साथ हुआ। किन्तु हम कठिनाई से ही यह
विश्वास कर सकते हैं कि जब तक कोई पक्ष इन उपेक्षित रचनाओं के सिद्धांत
विशेष की प्रामाणिकता अमान्य घोषित करने के लिए प्रयत्नशील न हो, पुराने
और युक्ति-युक्त अंशों को पवित्र रचनाओं से हटा दिया जाए और उन्हें बाद की
रचनाएं बता दिया जाए। तब तक ऐसी कल्पना का कोई आधार नहीं है फिर
सूत्रों के साथ ऐसा क्यों हुआ। हमें ब्राह्मण और मंत्रों की अपेक्षा उनके परवर्ती
होने के सिवाय ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि सूत्रों को श्रुति न बनाया जाय।
क्या ब्राह्मण ग्रंथकारों को स्वयं ज्ञात था कि ऋषियों की अधिकांश रचनाओं
और ब्राह्मण ग्रंथों के उद्भव के बीच युगों का अंतराल है। इस प्रश्न का उत्तर