सातीवीं पहेली
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सकारात्मक है। किन्तु जिस दुस्साहस के साथ भारतीय ब्रह्मज्ञानियों ने ब्राह्मण
ग्रंथों को वही पद और उनका काल मंत्रों के सामन निर्धारण किया, उससे यह
प्रकट होता है कि इसका कोई विशिष्ट कारण रहा होगा कि सूत्रों को उतनी ही
पावनता और प्राथमिकता न दी जाए।’’
सूत्रों को श्रुति की श्रेणी में न रखना एक पहेली है जिसका निराकरण किया जाना चाहिए।
इस विषय पर अनुसंधान करने वाले विद्वानों के समक्ष अन्य कूट प्रश्न भी हैं। उनका संबंध सूत्रों की श्रेणी में आने वाले साहित्य की विषयसामग्री में परिवर्तन और उनकी सापेक्ष प्रामाणिकता से है।
एक कूट प्रश्न साहित्य की उस श्रेणी से सम्बद्ध है जिसे ब्राह्मण कहा जाता है। एक समय ब्राह्मण ग्रंथ श्रुति की श्रेणी में आते थे। परन्तु लगता है, कालांतर में उनका यह स्थान नहीं रहा। स्मृति के निम्नांकित उद्धरण को देखने से लगता है कि मनु ख्1, ने ‘‘ब्राह्मण ग्रंथों’’ को श्रुति की श्रेणी से हटा दियाः
‘‘श्रुति का अर्थ है वेद और ‘स्मृति’ का अर्थ है विधान। इनकी विषय-सामग्री
पर तर्क नहीं किया जा सकता क्योंकि इनमें कर्त्तव्य-बोध है। ब्राह्मण ग्रंथ, जो
बुद्धिवादी लेखों पर आधारित हैं, वे ज्ञान के इन दो स्रोतों की निंदा करें तो उन्हें
संशयवादी और निंदक जानकर बहिष्कृत किया जाए ...... जो कर्त्तव्य-बोध चाहते
हैं, उनके लिए श्रुति सर्वोच्च सत्ता है।
ब्राह्मण ग्रंथों को श्रुति से क्यों निकाला गया?’’
III
अब हम साहित्य की उस श्रेणी पर आते है। जो स्मृति कहलाता है। जिसमें से सबसे महत्वपूर्ण मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति हैं। स्मृतियों की संख्या लगातार बढ़ती रही और यह सिलसिला अंग्रेजों के आगमन तक जारी रहा। मित्रमिश्र 57 स्मृतियों का, नीलकंठ 97 का और कमलाकर 131 स्मृतियों का उल्लेख करते हैं। हिन्दुओं द्वारा पवित्र समझे जाने वाले धार्मिक साहित्य में स्मृति साहित्य अपेक्षाकृत अधिक है।
वेदों और स्मृतियों के बीच संबंध के बारे में अनेक बातें हैं।
- कुछ लोग तर्क कर सकते हैं कि ‘वेद’ शब्द में ब्राह्मण भी संकलित हैं। यह वास्तव में एक सच्चाई है।
लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मनु ने ‘श्रुति’ को प्रतिबंधित अर्थ में प्रयुक्त किया ताकि ‘ब्राह्मणों’ को
अलग रखा जाए। इस कथन की इस बात से पुष्टि होती है कि मनुस्मृति में ब्राह्मणों का उल्लेख नहीं
है सिवाय एक स्थान पर (4.100) जहां वह कहता है कि मंत्रों का ही अध्ययन किया जाना चाहिए।