सातवीं पहेली: समय परिवर्तन या ब्राह्मण यह कैसे घोषित करते हैं कि वेद उनवेफ सभी शास्त्रों से तुच्छ हैं? - Page 69

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पहली बात यह है कि जैसा बौधायन, गौतम और आपस्तम्ब को धर्मशास्त्र का स्थान प्राप्त था, स्मृति को वह मान्यता प्राप्त नहीं थी ख्1, । स्मृति का संबंध मूल रूप से संस्कारों और परम्पराओं से था समाज के विद्वान उसकी अनुमति देते और अनुशंसा करते थे। जैसा कि प्रोफेसर अल्तेकर का मत हैः

आरम्भ में अपने लक्षण और विषय-सामग्री के कारण स्मृति सदाचार के समान

थी और वही उनका आधार था। स्मृतियां अस्तित्व में आईं तो स्वाभाविक था

सदाचार की परिधि सिमट गई, क्योंकि उसको अधिकांशतः संहिताओं में बांध लिया

गया था। उन्होंने उन प्राचीन प्रथाओं से जोड़ना आरंभ कर दिया गया जो स्मृतियों में

संहिताबद्ध नहीं थी अथवा जो नवीन थी और वे आरम्भिक धर्मशास्त्रों तथा स्मृतियों

में संहिताबद्ध हो गई थीं इस कारण सामाजिक मान्यता प्राप्त हो गयी थी।

दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि स्मृतियां वेद और श्रुति से भिन्न समझी जाती थीं। जहां तक उनकी मान्यता और प्रामाणिकता का प्रश्न था, उनका आधार नितांत भिन्न था। श्रुतियों को दैवी मान्यता थी। स्मृतियों की मान्यता सामाजिक थी। उनकी प्रामाणिकता के संबंध में पूर्व मीमांसा में दो नियमों का प्रावधान किया गया था। प्रथम नियम यह है कि यदि श्रुति के दो पाठों में भिन्नता है तो दोनों प्रामाणिक थे, और यह समझा जाता था कि वेदों ने यह विकल्प किया हुआ था कि उनमें से किसी एक को स्वीकार कर लिया जाए। दूसरा नियम यह है कि यदि स्मृति का कोई पाठ श्रुति के विपरीत है तो उसे तत्काल रद्द कर दिया जाए। यह नियम कठोरता से पालन किए जाते थे और इसका परिणाम यह हुआ कि स्मृतियों को न तो वेदों के समान स्थान मिला और न प्रामाणिकता।

यह आश्चर्यजनक बात है कि एक समय ऐसा आया जब ब्राह्मणों ने कलाबाजी खाई और स्मृतियों को वेदों से श्रेष्ठ घोषित कर दिया। प्रोफेसर अल्तेकर ने कहा हैः

स्मृतियों ने श्रुतियों के कुछ सिद्धांतों को वास्तव में निरस्त कर दिया जो तत्कालीन युग

की भावना के अनुरूप नहीं थे अथवा जिनका स्मृतियों से टकराव था। वैदिक परम्परा

के अनुसार प्रातः देव कर्म और दोपहर बाद पितृ कर्म करने का विधान था। कालांतर

में पितृ तर्पण लोकप्रिय हो गया और प्रातःकाल किया जाने लगा क्योंकि प्रातः स्नान

दैनिक कार्यों में सम्मिलित हो गया। यह तरीका उपरोक्त नियम के अनुसार वैदिक प्रथा

का प्रत्यक्ष उल्लंघन था। स्मृति-चंद्रिका के लेखक देवमभट्ट ने कहा है कि इसमें

कोई हर्ज नहीं है। श्रुति नियम को समझा गया कि उसमें पितृ-तर्पण का उल्लेख

है। पितृ-कर्म का नहीं। श्रुति साहित्य से ज्ञान होता है कि विश्वामित्र ने शुनःशेप

को गोद ले लिया था। यद्यपि उनके स्वयं एक सौ पुत्र जीवित थे। इस प्रकार यह

  1. इस विषय पर काणे मेमोरियल वाल्यूम, पृ. 18-25 पर प्रो. अल्तेकर का प्रभावपूर्ण लेख ‘धर्म के स्रोत

के रूप में स्मृतियों का स्थान’ देखें।