सातीवीं पहेली
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अनुमति मिलती है कि किसी व्यक्ति के भले ही उसके अपने अनेक पुत्र जीवित
हों, वह किसी अन्य के पुत्र को गोद ले सकता है। परन्तु मित्रमिश्र का कथन है
कि यह व्यवस्था दोषपूर्ण है। हम यह कल्पना कर सकते हैं कि स्मृतियों की प्रथाएं
भी श्रुति व्यवस्थाओं पर आधारित हैं जो इस समय उपलब्ध नहीं है परन्तु उनका
अस्तित्व माना जा सकता है।
वैदिक कथन ‘‘ना शेषो ज्ञेन्याजातमस्ति’’ पुत्र गोद लेने की प्रथा के विरुद्ध है जिसे कालातीत में स्मृति साहित्य में अनुसंशित किया गया। यह एक स्पष्ट उदाहरण है कि किस प्रकार स्मृति ने श्रुति को ठिकाने लगा दिया। परन्तु मित्रमिश्र का कथन है कि इस प्रथा में कोई दोष नहीं है। श्रुति का कथन मात्र अर्थवाद है। यह अपनी ओर से कोई निर्देश नहीं देतीं। दूसरी और स्मृतियों ने दत्तक पुत्र की व्यवस्था की है जिससे कि होम आदि उपयुक्त रीति से सम्पन्न हो सकें। इस प्रकार स्मृति के पाठ द्वारा अर्थवाद श्रुति को पूर्णतः निरस्त कर दिया, जिसने ऐसा विधान किया था।
कालांतर में वैदिक निर्देशों के विपरीत सती प्रथा शुरू हुई। वेद आत्महनन के विरोध में है। फिर अपरार्क ने तर्क दिया है कि श्रुति के साथ भिन्नता होने से यह प्रथा अवैध नहीं हो जाती क्योंकि श्रुति में एक सामान्य सिद्धांत के रूप में आत्महत्या का निषेध किया गया है। जबकि स्मृति में विधवा के संबंध में इसके अपवादी की व्यवस्था की है।
सती प्रथा और दत्तक प्रथा ठीक है अथवा नहीं। यह एक भिन्न प्रश्न है। समाज ने किसी भी प्रकार उन्हें स्वीकार कर लिया। स्मृतियों ने उन्हें सैद्धांतिक मान्यता दे दी और वेदों की सत्ता के विरुद्ध मान्यता देने के लिए कहा।
प्रश्न यह है कि वेदों की श्रेष्ठता के लिए इतने दिन तक संघर्ष कर के वेदों का स्थान गिरा कर स्मृतियों को क्यों वेदों के ऊपर शिरोधार्य किया गया? उन्होंने वेदों को देवों से भी अधिक मान्यता दी फिर उन्हें घसीटकर स्मृतियों से भी नीचे क्यों डाल दिया जबकि स्मृतियों को मात्र सामाजिक मान्यता प्राप्त थी?
उन्होंने जो उपाय किए, वे इतने विदग्ध और कृत्रिम थे कि हमें संशय हो सकता है कि कोई निश्चित इरादा अवश्य होगा कि स्मृतियों को वेदों से श्रेष्ठ माना जाने लगा।
यह स्पष्ट करने के लिए कि उनके तर्क कितने कृत्रिम, भ्रामक, और कुंठित थे, यह उचित होगा कि उनका संक्षिप्त विवरण दिया जाए।
एक कृत्रिम तर्क का उदाहरण सामने आता है जब हम बृहस्पति के कथन पर विचार करते हैं। उनके अनुसार श्रुति और स्मृति ब्राह्मण की दो आंखें हैं। यदि उनमें से एक फूट जाएगी तो वह एकाक्षी रह जाएगा।