सातवीं पहेली: समय परिवर्तन या ब्राह्मण यह कैसे घोषित करते हैं कि वेद उनवेफ सभी शास्त्रों से तुच्छ हैं? - Page 71

56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

एक कुतर्क के रूप में कुमारिल भट्ट की दलील पर भी विचार किया जा सकता है। उनका तर्क अनुपलब्ध श्रुति के सिद्धांत पर आधारित है। स्मृतियों के नाम पर यह कहा गया कि उनके मत को रद्द नहीं किया जा सकता चाहे वह श्रुति के प्रतिकूल भी क्यों न हों? क्योंकि हो सकता है कि वास्तविक रूप में यह विद्यमान श्रुति एवं अनुपलब्ध श्रुति के बीच तारतम्य हो। इस प्रकार स्मृति को अनुपलब्ध श्रुति बना दिया गया।

ब्राह्मणों ने स्मृतियों को वेदों से श्रेष्ठ भी नहीं तो उनके समान स्थान देते हेतु एक तीसरा उपाय खोजा। यह अत्रि स्म ृति में प्राप्य है। अत्रि का कहना है कि जो स्मृतियों की सत्ता स्वीकार नहीं करते, वे शाप के भागी हो सकते हैं। अत्रि का सिद्धांत है कि ब्राह्मण श्रुति और स्मृति के संयुक्त अध्ययन की परिणति है। यदि कोई व्यक्ति मात्र वेदों का पाठ करता है और स्मृति की अवमानना करता है तो उसे तत्काल यह शाप दिया जा सकता है कि वह 21 योनियों तक वन्य जंतु बने।

ब्राह्मणों ने स्मृतियों को श्रुति के समान रखने के ऐसे उपाय क्यों किए? उनका उद्देश्य क्या था? उनका अभिप्राय क्या था?

प्रोफेसर अल्तेकर का कहना है कि स्मृतियों को वेदों की अपेक्षा उच्चता इस कारण दी गई है कि कालांतर में स्थापित परम्पराओं को विधि-विधान के रूप में वैधता के औचित्य को चुनौती दी जा सकती थी। यदि यही बात थी तो वैदिक काल में भी विधि-विधान थे, प्रथाएं बाद में पड़ीं और यदि दोनों के बीच कोई भिन्नता हो तो इस तर्क को समझा जा सके कि स्मृतियों के प्रगतिशील सिद्धांतों को मान्यता इस कारण दी गई कि उनमें टकराव दूर कर दिया गया था। बात ऐसी नहीं है। वेदों में विधि-विधान नहीं है। प्रोफेसर काणे का मत हैः

‘‘सभी कानून प्रथाओं के रूप में थे और प्रथाओं को मान्यता प्रदान करना आवश्यक

नहीं था क्योंकि वे नागरिकों द्वारा मान्यता प्राप्त थे। दूसरे, स्मृतियों को वेदों की अपेक्षा

प्रगतिशील नहीं कहा जा सकता। चातुर्वर्ण्य के सिवाय जिनके विषय में सर्वविदित है

कि पूजा अर्चना छोड़कर समाज में विकास के सभी द्वार खुले थे। स्मृतियों ने वेदों के

अप्रगतिशील तत्वों जैसे चातुर्वर्ण्य सिद्धांत को ले लिया तथा उसका जमकर प्रचार

किया और उन व्यवस्थाओं को समाज के एक वर्ग के मत्थे मढ़ दिया।

इसी प्रकार कुछ और कारण भी हो सकते हैं, जिनके आधार पर ब्राह्मणों ने वेदों की अपेक्षा स्मृतियों को अधिक सम्मान दिया।’’

ब्राह्मणों को अपनी पहली कलाकारी से संतोष न हुआ। उन्होंने एक चाल और चली।

कालांतर में स्मृतियों के पश्चात् पुराण आए। वे कुल मिलाकर 36 हैं। इसमें 18 पुराण और उतने ही उप-पुराण हैं। एक प्रकार से तो सभी पुराणों की विषय-सामग्री समान है। उनका कथ्य, विश्व की सृष्टि, पालन और संहार है। परन्तु अन्य विषयों में