सातीवीं पहेली
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उनकी सामग्री नितांत भिन्न है। कुछ ब्रह्मा के उपासक हैं, कुछ शिव के और कुछ विष्णु के_ कुछ में वायु की, अग्नि की, और सूर्य की उपासना है तथा कुछ में अन्य देवी-देवताओं का गुणगान है।
यह बताया जा चुका है कि एक समय था जब पुराण श्रुति नहीं थे। किन्तु तदुपरांत एक क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। पुराणों को जिन्हें श्रुति से अलग रखने का कारण उनकी नितांत लौकिकता बताया गया था, अब वे वेदों से भी श्रेष्ठ हो गए।
वायु पुराण कहता हैः ख्1,
सर्वप्रथम सभी शास्त्र, पुराण ब्रह्मा के मुख से प्रस्फुटित हुए। तदुपरांत वेद।
मत्स्य पुराण वेदों से केवल पूर्ववर्ती होना ही घोषित नहीं करता बल्कि वह उनकी अनंतता के गुणों और नाद के साथ पहचान को भी श्रेष्ठ मानता है। पहले केवल वेदों को इन गुणों से सम्पन्न बताया जाता था।
वह कहता हैः ख्2,
सर्वप्रथम अविनाशी पितामह (ब्रह्म) उत्पन्न हुए, फिर वेद। उसके अंगोपांग तथा
उनके पाठ के विभिन्न साधन जन्में और प्रकट हुए। ब्रह्मा ने जिन शास्त्रों को
जन्म दिया उनमें सैकड़ों कोटि-कोटि मंत्रों वाले सनातन, नाद-जनित शुद्ध शास्त्र,
पुराण प्रथम थे फिर उनके मुख से वेदों का उद्गम हुआ, तभी मीमांसा और
न्याय और अष्ट प्रमाण सिद्धांत जन्मे।
भागवत पुराण वेदों के समान प्रामाणिकता का दावा करता है। वह कहता हैः ख्3,
ब्रह्मार्त का निर्णय है कि पुराण भागवत कहलाता है जो वेदों के समान है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण ने साधिकार दावा किया है कि वह वेदों से श्रेष्ठ है। वह कहता हैः ख्4,
जिस श्रद्धेय ऋषि के विषय में आपने प्रश्न किया है और जो आपकी इच्छा
है वह मुझे ज्ञात है। वह है पुराणों का सार अति विख्यात ब्रह्म वैवर्त पुराण जो
समस्त पुराणों, उप-पुराणों और वेदों की त्रुटियों का परिष्कार करता है।
ब्राह्मणों की यह दूसरी पहेली है जिसके अनुसार उन्होंने अपने पवित्र ग्रंथों को प्राथमिकता, प्रमुखता और प्रामाणिकता दी।
वेदों के पतन की कथा यहीं समाप्त नहीं होती। पुराणों के बाद साहित्य का एक अन्य रूप उभरकर आया-तंत्र ख्5, । इनकी संख्या काफी दुर्जेय है। शंकराचार्य ने 64 तंत्र गिनाए हैं। इनके अतिरिक्त भी बहुत से होंगे।
म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 27
म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, पृ. 28
और 3. म्यूर ने उद्धृत किया है, खंड 3
स्मृत धर्म और तांत्रिक धर्म पर और विचार के लिए इस भाग का परिशिष्ट 4 और 5 देखें।