58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस साहित्य का रचयिता दत्तात्रेय को बताया गया है जो हिंदू त्रिमूर्ति के अवतार कहे जाते हैं। अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और शिव। उन्हें इस प्रकार तीन सर्वोच्च देवों के समान ज्ञान का संगम कहा गया है। किन्तु वे मात्र शिव पर निर्भर हैं जिन्होंने अपनी भार्या दुर्गा अथवा काली को वे रहस्यात्मक सिद्धांत और अनुभव बताए जो उनके भक्तों को ज्ञात होने चाहिए, और जिनका उन्हें अनुशीलन करना चाहिए। कहा गया है कि यह प्रामाणिक अथवा उच्च परम्परा उनके केन्द्रीय अर्थात् पंचम मुख से प्रकट हुई। क्योंकि यह परम पावन और गुह्य ज्ञान है, इसलिए यह अदीक्षितों के समक्ष प्रकट नहीं होना चाहिए। इन्हें अगम कहा गया है। इस प्रकार वे वेदों के ज्ञान निगम धर्मशास्त्रों और अन्य ग्रंथों से भिन्न हैं।
तंत्र विशेष रूप से शाक्तों और उनके विभिन्न संप्रदायों के धार्मिक ग्रंथ हैं। तांत्रिकों की कई शाखाएं हैं जो अपनी भिन्न-भिन्न परम्पराओं को मानते हैं और उनके अंतरंग अनुयाइयों के अतिरिक्त अन्य की समझ के बाहर हैं। तांत्रिकों और दक्षिणाचारियों के कर्मकांड शुद्ध और वेदानुकुल बताए गए हैं, जबकि वामांचारियों को केवल शूद्रों के लिए बताया गया है।
तंत्रों के उपदेश पुराणों की तरह भक्तिमार्ग पर आधारित और उपनिषदों एवं ब्राह्मणों के कर्ममार्ग तथा ज्ञानमार्ग से श्रेष्ठ कहे जाते हैं। इनमें एक देव की आराधना का निर्देश दिया गया है। विशेष रूप से शिव-भार्या का, जो जगतजननी कही गई है। इन सभी रचनाओं में नारी गुणों को साकार मानकर प्रमुखता दी गई है। पुरुषों की प्रायः उपेक्षा की गई है।
वेदों और तंत्रों में क्या संबंध है? मनुस्मृति के विख्यात भाष्यकार कुल्लूक भट्ट को यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि श्रुति के दो अंग हैं, वेद और तंत्र। इसका अर्थ हुआ वेद और तंत्र का समान स्तर है। कुल्लूक भट्ट की तरह वैदिक ब्राह्मणों ने वेदों और तंत्रों को समान माना है बल्कि तंत्र लेखक तो चार कदम आगे हैं। उनका दावा है कि वेद शास्त्र और पुराण एक सामान्य नारी के समान है, जबकि तंत्र एक कुलीन नारी की भांति है। इसका आशय यही है कि तंत्र वेदों से श्रेष्ठ हैं।
इस सर्वेक्षण से एक तथ्य स्पष्ट है कि ब्राह्मणों को अपने धार्मिक साहित्य में कभी अटल विश्वास नहीं रहा। उन्होंने यह बताने के लिए संघर्ष किया कि वेद केवल पवित्र ग्रंथ ही नहीं बल्कि संशय-रहित हैं। यही नहीं कि उन्होंने कहा है कि वेद संशय-रहित हैं अपितु उन्होंने इस संबंध में मनगढ़ंत सिद्धांत और तर्क प्रस्तुत किए। इसके बाद वेदों को पहले उन्होंने स्मृतियों से हीन बताया फिर पुराणों से और अन्ततोगत्वा तंत्र से भी निचले गर्त में डाल दिया। यह यक्ष प्रश्न है कि आखिर ब्राह्मणों ने अपने पवित्रतम ग्रंथ वेदों की यह दुर्दशा क्यों बनाई कि वे स्मृतियों, पुराणों और तंत्र तक से तुच्छ हो गए।