आठवीं पहेली
वेद विरुद्ध उपनिषदों का घोषित युद्ध
वेदों के संदर्भ में उपनिषदों की स्थिति क्या है? क्या उनका एक-दूसरे के प्रति सौहार्द है या फिर प्रतिस्पर्धा? सचमुच कोई हिंदू अब यह स्वीकार नहीं करेगा कि वेद और उपनिषद एक-दूसरे के प्रतिकूल हैं। इसके विपरीत यह अवधारणा है कि उनके बीच कोई प्रतिरोध नहीं है और दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। क्या यह विश्वास सारगर्भित है?
इस विश्वास का प्रमुख कारण यह तथ्य है कि उपनिषदों का दूसरा नाम वेदांत है। वेदांत के दो अर्थ हैं। एक से परिलक्षित होता है कि वेदों का अंतिम भाग हैं। दूसरा अर्थ - वेदों का सार। वेदांत शब्द उपनिषद् का दूसरा नाम होने के कारण उसके यह अर्थ उपनिषदों ने अंगीकार कर लिए। इसी अर्थ के कारण यह धारणा है कि वेद और उपनिषदों में कोई खींचातानी नहीं है।
वास्तव में किसी सीमा तक उपनिषदों के लिए यह अर्थ सार्थक है? पहली बात तो यही है कि ‘वेदांत’ शब्द का अर्थ जान लिया जाए। वेदांत का मूल अर्थ क्या था? क्या इसका अर्थ वेदों का अंतिम अंग है?
जैसा कि प्रोफेसर मैक्समूलर ख्1, ने अवलोकन किया किः
वेदांत एक तकनीकी शब्द है और मूलरूप से इसका अर्थ वेदों का अंतिम अंश नहीं
है और न ही वैदिक साहित्य का अंतिम अध्याय है। अपितु वेदों का अंतिम मनोरथ
है। तैत्तरीय आरण्यक (सम्पादक राजेन्द्र मित्र. पृ. 820) जैसे ग्रंथों में कुछ ऐसे
वाक्यांश हैं, जिनसे भारतीय और यूरोपीय विद्वानों को भ्रांति हुई है कि वेदांत का
सरल सा अर्थ है-वेदों का उपसंहारः ‘‘या वेदादु स्वरः प्रकटो वेदांते का प्रतिष्ठितः
- दि उपनिषद् (एस.बी.ई) खंड 1, भूमिका
15 पृष्ठों की यह टंकित पांडुलिपि लेखक के हाथ से संशोधित है। मूल रूप से इसका शीर्षक ‘‘वेदा वर्सेस उपनिषद’’ था। अंतिम दो परिच्छेद लेखक ने हाथ से जोड़े हैं। - संपादक