आठवीं पहेली: वेद विरुद्ध उपनिषदों का घोषित युद्ध - Page 75

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ओýम् से वेद का आरम्भ होता है और उसी से वेद का समापन होता है। यहां

वेदों का जो सीधा अर्थ है वह वेदादू के विपरीत है जैसा कि सायण ने इसका

अनुवाद किया है। उसका अनुवाद वेदांत अथवा उपनिषद के रूप में असंभव

है। वेदांत दर्शन के रूप में तैत्तरीय आरण्यक पृष्ठ 817 में दिग्दर्शित हुआ है।

नारायणिया उपनिषद् के एक मंत्र में, जिसकी आवृति मांडुक्य उपनिषद तीन, 2,

6 में तथा अन्यत्र भी हुई है। ‘वेदांत विज्ञान सुनिश्चितारह’ जो विद्वान वेदांत

मर्मज्ञ हैं, उनके अनुसार वह वेदों का उपसंहार नहीं और श्वेताश्वतर उप. 6, 22

वेदांत प्रमाणम गुहयम नहीं, भाष्यकार के मन में यह वेद का उपसंहार नहीं जो

कालांतर में बहुवचन के रूप में प्रयुक्त हुआ है। अर्थात् भाष्यकार ने कहा हैः

‘‘क्षुरीकोपनिषद, 10 (बिबलि इंड, पृ. 210) पुण्डांरिकेति वेदांतेषु निगादयाते,’

वेदांत को छांदोग्य तथा अन्य उपनिषदों में पुण्डरीक कहा गया है परन्तु यह

प्रत्येक वेद का अंतिम ग्रंथ नहीं।

इस संबंध में गौतम धर्म सूत्र में और स्पष्ट साक्ष्य उपलब्ध है। अध्याय 19 के बारहवें मंत्र में शुद्धीकरण पर गौतम का कथन हैः

‘‘शुद्धीकरण (पाठ) उपनिषद वेदांत संहिता - सभी वेदों के पाठ (हैं)’’ आदि।

इससे यह स्पष्ट है कि गौतम के समय उपनिषद और वेद अलग-अलग माने जाते थे और उपनिषद वेदों का अंग नहीं माने जाते थे। हरदत्त ने अपने भाष्य में कहा है ‘‘आरण्यक के वे अंश जो (उपनिषद) नहीं है, वेदांत कहलाते हैं। यह निर्विवाद साक्ष्य है कि उपनिषद वैदिक सिद्धांतों से भिन्न थे।

भगवत्गीता में वेद के उल्लेख से भी इसी विचार को बल मिलता है। भगवतगीता में वेद शब्द का अनेक स्थानों पर उल्लेख है। श्री भट्ट ख्1, के अनुसार इस शब्द का प्रयोग इस भाव से किया गया है कि लेखक ने इस आशय से उपनिषद को सम्मिलित नहीं किया है।

उपनिषदों की विषयवस्तु भी वेदों से भिन्न हैं। यह दूसरा तर्क है कि उपनिषद वेदों का अंग नहीं है। ‘उपनिषद’ शब्द की व्युत्पत्ति क्या है? यह अस्पष्ट है। अधिकांश यूरोपीय विद्वान उपनषिद् की व्युत्पत्ति ‘‘षद’’ धातु से मानते हैं जिसका अर्थ है ‘‘बैठना’’। इसके पूर्व दो सर्ग ‘‘नि’’ और ‘‘उप’’ हैं जिनमें ‘‘नि’’ का अर्थ है ‘‘नीचे’’ और ‘‘उप’’ का आशय है ‘‘निकट’’। इस प्रकार इसका आशय है समागम अथवा सभा। जिसका तात्पर्य है गुरु के निकट बैठकर उसका उपदेश सुनना। यही कारण है कि त्रिखंडाशेष में उपनिषद की व्याख्या ‘समीप साधना’ अथवा किसी व्यक्ति के पास बैठना है।

  1. सैक्रेड बुक्स ऑफ दी ईस्ट, खंड 2, पृ. 275