आठवीं पहेली: वेद विरुद्ध उपनिषदों का घोषित युद्ध - Page 76

आठवीं पहेली

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परन्तु जैसा कि प्रो. मैक्समूलर ने मत व्यक्त किया है, इस व्युत्पत्ति को स्वीकार करने में दो आपत्तियां हैं। पहली बात तो यह है कि ऐसा लगता है कि ऐसा शब्द वेद के उपनिषद समेत अन्य अंश के लिए प्रयुक्त हुआ होगा तो इसके सीमित अर्थ कैसे किए गए? फिर समागम के रूप में उपनिषद का प्रयोग सार्थक नहीं लगता। जहां भी इस शब्द का प्रयोग हुआ है, इसका अर्थ है सिद्धांत अथवा इसका प्रयोग दार्शनिक लेख के रूप में हुआ है। जिसका आशय है गुह्य सिद्धांत।

प्रोफेसर मैक्समूलर ने शंकर के अन्य भाष्य का उल्लेख किया है जो तैत्तरीय उपनिषद 2, 9 के विषय में है। उनके अनुसार उपनिषद से परम आनन्द प्राप्त होता है। इसी कारण उसे उपनिषद कहते हैं। इस संबंध में प्रो. मैक्समूलर कहते हैंः

‘‘आरण्यकों में ऐसी व्युत्पतियों की भरमार है जो वास्तविक नहीं शब्दों के साथ खिलवाड़ है, फिर भी उनका कुछ अर्थ निकल आता है।’’

फिर भी प्रो. मैक्समूलर ‘उपनिषद’ शब्द का मूल ‘षद’ धातु से विनाश के अर्थ में मानते हैं, अर्थात् ऐसा ज्ञान जो मोक्ष के साधन के लिए ब्राह्मणों के ज्ञान से अज्ञान का विनाश करता है। प्रो. मैक्समूलर का कथन है कि भारतीय विद्वान उपनिषद का यही अर्थ निकालने पर सर्वसम्मत है।

यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि उपनिषद शब्द का जो अर्थ मैक्समूलर सुझाते हैं वह सही है तब यह एक ऐसा साक्ष्य होगा कि हिंदुओं में भ्रांतियां हैं और वेदों तथा उपनिषदों की विषय-वस्तु एक-दूसरे की पूरक नहीं वरन उनमें विरोधाभास है कि निःसंदेह उपनिषदों की विचार-पद्धति वेदों के प्रतिकूल है। वेदों का खंडन प्रकट करने के लिए उपनिषदों के कुछ उदाहरण पर्याप्त हैं।

मुण्डकोपनिषद का कथन है -

  1. सभी देवताओं में सबसे पहले विश्वनियंता, जगतपालक ब्रह्मा उत्पन्न हुए। उन्होंने

अपने ज्येष्ठतम पुत्र अथर्व को ब्रह्मविज्ञान की शिक्षा दी जो समस्त ज्ञान का आध

ार है। 2. अथर्व ने यह ज्ञान, जो उन्हें ब्रह्मा से मिला था, अंगिस को दिया_ उन्होंने

भारद्वाज की संतति सत्यवाह को समझाया जिन्होंने किंवदंतियों के अनुसार यह ज्ञान

अंगिरस को दिया। 3. शौनक पूर्ण शिष्टाचार पूर्वक अंगिरस के पास गए और पूछा-

‘‘हे आदरणीय ऋषि, वह कौन सा साधन है जिससे इस सम्पूर्ण जगत का ज्ञान हो

सकात है।’’ 4. अंगिरस ने उत्तर दिया, ये दो विधाएं पवित्र विद्याओं में इस प्रकार

मानी जाती हैं, एक श्रेष्ठ और दूसरी अश्रेष्ठ। 5. अश्रेष्ठ विद्याएं हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद,

सामवेद, अथर्ववेद, स्वाराघात, आध्यात्मिक व्याकरण, भाष्य, पिंगल और खगोल

शास्त्र। श्रेष्ठ विद्या अक्षय, अनित्य है, जिसका आशय उपनिषदों से है।