62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
छांदोग्य उपनिषद् के अनुसारः
(1) ‘‘नारद सनत्कुमार के पास गये और कहा- ‘‘मुझे उपदेश करें’’। नियमानुसार आये हुए नारद से सनत्कुमार ने कहा- तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे पास आओ, फिर मैं तुम्हें तुम्हारे ज्ञान से आगे उपदेश करूंगा।’’ (2) ऐसा सुनकर नारद ने कहा, ‘‘मैं ऋग्वेद पढ़ा हूं। यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद भी जानता हूं। सिवाय इनके इतिहास, पुराण रूप पंचमवेद, वेदों का वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, कलानिधि शास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, शिक्षाकल्प, छंद और ब्रह्मविद्या, भूतशास्त्र, धनुर्वेद, ज्योतिषविद्या, गारुड़विद्या, नृत्य संगीतादि विद्या - यह सब मैं जानता हूं। (3) यह सब जानते हुए भी वह मैं केवल शब्दार्थ मात्र ही जानता हूं, आत्मा को मैं नहीं जानता। मैंने आप पूज्यजनों के जैसे महापुरुषों से सुना है। आत्मज्ञानी शोक को पारकर जाता है। मैं तो शोक करता हूं। ऐसे शोकग्रस्त मुझे शोक से पारकर देवें, अर्थात् मुझे अभय प्राप्त करा देवें। ऐसा सुनकर सनत्कुमार ने नारद से कहा- ‘‘अभी तक यह जो कुछ तुम जानते हो, वह नाममात्र ही है’’। (4) क्योंकि ऋग्वेद नाम है_ यजुर्वेद, सामवेद, चौथा अथर्ववेद, पांचवां वेद इतिहास पुराण, व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पात ज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, वेद विद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड़, संगीतादि कला और शिल्पशास्त्र - ये सब भी नाम ही हैं। अतः प्रतिमा में विष्णु बुद्धि के समान। तुम नाम की ब्रह्म बुद्धि से उपासना करो। (5) वह जो नाम ब्रह्मा है, ऐसी उपासना करता है, जहां तक नाम की गति है, वहां तक नाम के विषय में उस उपासक की यथेष्ट गति हो जाती है। जो ‘‘यह ब्रह्म है’’ इस प्रकार नाम की उपासना करता है। (नारद ने कहा) भगवान् क्या नाम से बढ़कर भी कोई वस्तु है। सनत्कुमार ने कहा नाम से भी बढ़कर वस्तु है। तब नारद ने कहा भगवन्, मुझे उसका ही उपदेश करें।’’
बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसारः
इस सुषुप्तावस्था में पिता अपिता हो जाता है, माता अमाता हो जाती है अर्थात् जन्य जनक भाव संबंध नहीं रह जाता। लोक अलोक हो जाते हैं। देव अदेव और वेद अवेद हो जाते हैं, अर्थात् सभी साध्य-साधन का अभाव हो जाता है। यहां पर चोर अचोर हो जाता है। भ्रूण हत्यारा अभ्रूण हो जाता है। चांडाल-चांडाल नहीं रह जाता है। पुल्कस अपौल्कस हो जाता है। शूद्र से ब्राह्मणी में उत्पनन संतान को चाण्डाल कहते हैं। शूद्रा में ब्राह्मण से उत्पनन संतान को निषाद कहते हैं एवं निषाद से क्षत्रिय में उत्पन्न संतान को पुल्कस कहते हैं। परिव्राजक अपरिव्राजक और वानप्रस्थी अतापस