आठवीं पहेली: वेद विरुद्ध उपनिषदों का घोषित युद्ध - Page 78

आठवीं पहेली

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हो जाता है, अर्थात् किसी वर्णाश्रम धर्म की या पुण्य-पाप की प्रतीति नहीं होती। उस समय यह पुरुष पुण्य से असंबद्ध तथा पास से भी संबंध रहित हो जाता है। किंबहुनाः- उस अवस्था में हृदयस्थ समस्त शोकों को पार कर जाता है।

कठोपनिषद का मत निम्न प्रकार से हैः

आत्मा उपदेश से प्राप्त नहीं। न ही ज्ञान से, न पठन से। वह उसी को प्राप्त होती है जिसे वह चाहे। आत्मा उसी शरीर में वास करती है जिसे वह चुन लेती है।

यद्यपि आत्मा का ज्ञान कठिन है तथापि समुचित साधनों से उसे जाना जा सकता

है। वह (लेखक) कहता है, इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे न तो उपदेश

से ना ही कई वेदों के ज्ञान से न बुद्धि से न पुस्तकों के रखने से ना ही मात्र

पाठन से। फिर वह कैसे लभ्य हैं? वह यह घोषित करता है।

उपनिषदों में कितनी प्रतिकूलता है और इनकी दार्शनिकता कितनी असंगत है, इसका आभास तभी हो सकता है जब कोई हिंदुओं की विवाह-पद्धति अनुलोम और प्रतिलोम शब्दों का उत्पत्ति समझेगा। उसकी उत्पत्ति के विषय में काणे ख्1, का कथन है-

अनुलोम और प्रतिलोम (विवाह की परम्परा) ये दोनों वैदिक साहित्य में दुर्लभ

हैं। बृहदारण्यक उपनिषद (2,1.5) और कौषीतकि (4,8) में प्रतिलोम शब्द का

प्रयोग उस स्थिति के लिए किया गया है, जब कोई ब्राह्मण, ब्राह्मण के विषय

में ज्ञान प्राप्त करने के लिए क्षत्रिय के पास जाए।

अनुलोम का अर्थ है, शास्त्रानुसार सहज परम्परा से कार्य सम्पन्न होगा, प्रतिलोम का अर्थ है सहज परम्परा के विपरीत। श्री काणे के कथनानुसार प्रतिलोम की परिभाषा के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि उपनिषदों को वैदिक साहित्य की मान्यता नहीं है। उन्हें यदि तिरस्कृत भी नहीं किया गया है तो भी वैदिक ब्राह्मणों ने उनका स्थान तुच्छ रखा है। वह एक और प्रमाण है जो प्रकट करता है कि वेदों और उपनिषदों का संबंध सौहार्दपूर्ण न होकर प्रतिस्पर्धापूर्ण है।’’

उपनिषदों का अध्ययन करने वाले ब्राह्मणों के प्रति वैदिक ब्राह्मणों के व्यवहार का एक अन्य उदाहरण भी है। बौधायन ने अपने धर्मसूत्र (8.3) में कहा है। श्राद्ध क्रिया के लिए यदि कोई अन्य ब्राह्मण उपलब्ध न हो तो किसी रहस्यविद् को बुलाया जाए। रहस्यविद् का अर्थ है उपनिषद पाठी ब्राह्मण।

यह धारणा कि वेदों और उपनिषदों के संबंध सौहार्दपूर्ण हैं, वास्तव में एक पहेली है।

  1. हिस्ट्री आफ धर्मशास्त्र, खंड 2, भाग 1, पृ. 52