नौवीं पहेली
उपनिषद वेदों के अधीनस्थ कैसे बने?
पिछले अध्याय में हमने देखा कि मूलतः उपनिषद वेदों का अंग नहीं थे और सिद्धांतों की दृष्टि से दोनों परस्पर विरोधी हैं। वेदों और उपनिषदों के परवर्ती संबंधों की तुलना करना उचित होगा। उनके परवर्ती संबंधों के ज्ञान के लिए सर्वोत्तम उदाहरण दो दार्शनिक जैमिनि और बादरायण का विवाद है।
जैमिनि मीमांसा सूत्रों के रचयिता हैं जबकि बादरायण ब्रह्मसूत्र के सृष्टा_ जैमिनि वेदों की श्रेष्ठता के पक्षधर हैं जबकि बादरायण उपनिषदों के।
विवाद का बिंदु था- क्या बलि देना आवश्यक है? वेद कहते हैं ‘‘हां’’ और उपनिषद कहते हैं ‘‘नहीं’’।
बादरायण ने जैमिनि की स्थिति अपने सूत्र 2-7 में स्पष्ट की है और शंकराचार्य ने उसका भाष्य किया है।
जैमिनि कहते हैं ख्1, ः
कोई उस समय तक बलि नहीं देता जब तक कि उसे इस बात का ज्ञान न हो
कि वह शरीर से भिन्न है और मृत्यु उपरांत वह स्वर्ग जाएगा, जहां उसे बलि का
फल प्राप्त होगा। आत्मज्ञान संबंधी ज्ञान किसी का मार्गदर्शन मात्र है। इस प्रकार
बलि का उस पर प्रभुत्व है।
संक्षेप में जैमिनि का मत है कि वेदांत का कथन है कि आत्मा देह से भिन्न है और वह देह से अधिक काल तक अस्तित्व में रहती है। ऐसा ज्ञान पर्याप्त नहीं है। आत्मा की मनोरथ स्वर्ग प्राप्ति हो सकता है। किन्तु वह स्वर्गारूढ़ नहीं हो सकती जब
- देखें, बादरायण सूत्र 2 और इस पर शंकर की टिप्पणी।
इस अध्याय में इसका शीर्षक ‘जैमिनी वर्सेस बादरायण’ था जो बाद में रेखांकित किया गया। यह नौ पृष्ठों की टंकित पाण्डुलिपि है। इसके पहले दो पृष्ठ लेखक ने स्वयं संशोधित किए हैं। - संपादक