नौवीं पहेली
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तक कि वैदिक यज्ञ न किया जाए। यहीं उसके कर्मकांड का मूलमंत्र है। इस प्रकार उनका कर्मकाण्ड ही मुक्ति मार्ग है और इस प्रकार ज्ञान-कांड निरर्थक है। इसलिए जैमिनि उन लोगों के विरुद्ध है जो वेदांत ख्1, में आस्था रखते हैं।
विदेह के राजा जनक ने यज्ञ किया जिसमें उदारता पूर्वक दक्षिणा दी गई (बृह. 3.1.1.)। महोदय, मैं बलि दे रहा हूं (छांदो. 5.11.5) जनक और अश्वपति दोनों ही आत्मज्ञानी थे। यदि वे दोनों ही आत्मज्ञानी थे तो वे मुक्ति पा चुके थे फिर यज्ञ करने की आवश्यकता ही नहीं थी। परन्तु दोनों प्रसंगों में कहा गया है कि उन्होंने यज्ञ किया। इससे प्रमाणित होता है कि मुक्ति तभी मिल सकती है जब यज्ञ किया जाए न कि आत्मज्ञान से, जैसा कि वैदांतिक कहते हैं।
जैमिनि ने एक रचनात्मक बात कही ख्2, है कि शास्त्रों में निरापद कथन है कि ‘‘आत्मज्ञान यज्ञ की अपेक्षा गौण है।’’ जैमिनि इसे उचित ख्3, बताते हैं क्योंकि उनका मत है कि दोनों (ज्ञान और कर्म) समानांतर चलते हैं। (मृत-आत्मा को फल देने हेतु) जैमिनि बादरायण के ज्ञानकांड को स्वतंत्र साधन नहीं मानते। वे इसके दो आधार बताते हैं।
प्रथम ख्4, µ ‘‘आत्मज्ञान स्वतः कोई फलदायक नहीं।’’
द्वितीय ख्5, µ ‘‘वेदों की सत्ता के अनुसार ज्ञान, कर्म की अपेक्षा गौण है।’’
जैमिनि और उनके कर्मकांड पर बादरायण की क्या स्थिति है।’ इसका उल्लेख बादरायण ने अपने सूत्रों 8 से 17 में किया है।
पहला मत ख्6, यह है कि जैमिनि ने जिस ‘‘आत्मा’’ का जिक्र किया है, वह सीमित आत्मा है अर्थात् आत्मा और परमेश्वर भिन्न है और शास्त्रों में ‘‘परमेश्वर को मान्यता है।’’
बादरायण का दूसरा मत है ख्7, कि वेद आत्मज्ञान और यज्ञ दोनों के पक्षधर हैं।
बादरायण का तृतीय विचार है ख्8, कि यज्ञ वही कर सकते हैं, जिन्हें वेदों में आस्था
देखें, बादरायण सूत्र 3 और शंकर की इस पर टिप्पणी।
देखें, बादरायण सूत्र 4
देखें, बादरायण सूत्र 5
देखें, बादरायण सूत्र 6
देखें, बादरायण सूत्र 7
देखें, बादरायण सूत्र 8
देखें, बादरायण सूत्र 9
देखें, बादरायण सूत्र 12