नौवीं पहेली 67
इसी में इतिश्री नहीं है। बादरायण ने यह किया कि उन्होंने कहा कि उपनिषद के दो भाव हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि उपनिषद वैदिक साहित्य का अंग है। उनका कथन है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, वेदांत अथवा ज्ञानमार्ग वेदों के कर्मकांड के विरुद्ध नहीं है। दरअसल बादरायण के वेदांत सूत्र का यही स्वरूप है।
बादरायण का यह सिद्धांत उपनिषदों के अभिप्राय और वेद तथा उपनिषदों की संबद्ध स्थिति से भिन्न है। जब वे अपने सूत्र में कहते हैं कि उपनिषद वेदों के अंग हैं और दोनों के बीच कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, बादरायण का व्यवहार समझ में नहीं आता। किन्तु यह बिल्कुल स्पष्ट है कि वे दिग्भ्रमित हैं और अपने विरोधी के समक्ष उनकी स्थिति दयनीय है जो अपने विपक्षी की वैधता स्वीकार करते हुए, उसके आगे घुटने टेक देते हैं। वेदों के संशय-रहित होने पर जो उपनिषदों के विरुद्ध हैं बादरायण जैमिनि के आगे झुक जाते हैं। वह सत्य के सम्मुख टिके क्यों नहीं रहते, पूर्ण सत्य, सत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं जैसा कि उपनिषदों ने दिग्दर्शित किया? बादरायण ने अपने वेदांत सूत्रों में उपनिषदों के साथ विश्वासघात किया। उन्होंने ऐसा क्यों किया?