दसवीं पहेली
ब्राह्मणों ने हिंदू देवताओं को एक-दूसरे से क्यों लड़ाया?
विश्व के संबंध में हिंदुओं का तत्वज्ञान त्रिमूर्ति पर आधारित है। उनके अनुसार विश्व की तीन स्थितियाँ हैं। सृष्टि, पालन और संहार। यह एक अविरल क्रम है। यह तीन कार्य ब्रह्मा, विष्णु और महेश द्वारा किए जाते हैं। ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की। विष्णु इसका पालनहार है और महेश संहारक। ये देवता त्रिमूर्ति कहे जाते हैं। त्रिमूर्ति के सिद्धांत से परिलक्षित है कि तीनों का पद समान है। ऐसा कार्य सम्पन्न करते हैं, जो अन्योन्याश्रित है, उनमें कोई विरोध नहीं। वे परस्पर मित्र हैं, विरोधी नहीं। वे परस्पर सहायक है, शत्रु नहीं।
इन तीन देवों के कार्यों का उल्लेख करने वाले साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि स्थिति बिल्कुल भिन्न है। कथनी ओर करनी में अंतर है। ये देव परस्पर मित्र होने के स्थान पर एक-दूसरे के शत्रु हैं, जो श्रेष्ठता और सत्ता के लिए एक-दूसरे से भिड़ जाते हैं। पुराणों के कुछ उदाहरण स्थिति स्पष्ट कर देंगे।
एक समय था जब विष्णु और शिव की अपेक्षा ब्रह्मा परमदेव थे। ब्रह्म को जगत नियंता बताया गया है अर्थात् प्रथम प्रजापति। वे शिव के भी जनक हैं कि विष्णु के भी स्वामी हैं। यदि विष्णु सृष्टि के पालक हैं तो इसका आदेश उन्हें ब्रह्मा से मिला है। ब्रह्मा का परम पद ऐसा पद है कि रुद्र और नारायण तथा कृष्ण और शिव के बीच विवाद पर निर्णय ब्रह्मा देते हैं।
इतना ही ध्रुव सत्य है कि कालांतर में ब्रह्मा का शिव और विष्णु से संघर्ष हुआ और आश्चर्य है कि अपने विरोधियों के समक्ष उन्हें अपनी श्रेष्ठता से हाथ धोना पड़ा। विष्णु के साथ उनके संघर्ष के दो उदाहरण हैंः
मूल शीर्षक ‘गॉड एट वार’ था। यह 25 पृष्ठों की टंकित और संशोधित पाण्डुलिपि थी। इसके अंतिम तीन पृष्ठ लेखक ने हाथ से लिखे। - संपादक