दसवीं पहेली
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जिसके अनुसार विष्णु ब्रह्मा के नथुनों से सूकर रूप में उत्पन्न हुए और स्वाभाविक रूप से बाराह बन गए- विष्णु के वाराह अवतार का यह बहुत तुच्छ विश्लेषण है।
इसके पश्चात् ब्रह्मा ने शिव-विष्णु के बीच शत्रुता उत्पन्न कराने की चेष्टा की। स्वाभाविक है कि अपनी स्थिति बेहतर बनाने के लिए यह चेष्टा की होगी। यह कथा रामायण में कही गई है। वह इस प्रकार हैः
जब राजा दशरथ, मिथिलापति जनक, जिसकी पुत्री से राम का विवाह हुआ था, से विदा लेकर अपने राज्य को लौट रहे थे तो उनके समक्ष अपशकुन हुए, उनके चारों ओर भयंकर स्वर वाले पक्षी चीख उठे और भूमि पर विचरने वाले मृग उनके दाहिनी ओर चलने लगे। यह देखकर दशरथ ने वशिष्ठ से पूछा, पक्षी चीख रहे हैं और मृग दाहिनी ओर चल रहे हैं, यह शकुन शुभ भी है और अशुभ भी है। यह क्या बात है? इससे मेरा हृदय शंका से भर उठा है। तब वशिष्ठ बोले यह परशुराम के आगमन की चेतावनी है जो तूफान की तरह चले आ रहे हैं, जिससे पृथ्वी कांप उठी, पेड़-पौधे गिरने लगे हैं और गहन अंधकार छा गया है। धूल से सूरज ढक गया है। परशुराम सामने से आ रहे हैं, बड़े भयानक दिखाई दे रहे हैं, कंधे पर फरसा और धनुष-बाण है। दशरथ ने उनका सम्मानपूर्वक अभिवादन किया, जिसे परशुराम ने स्वीकार कर लिया और दशरथ पुत्र राम की ओर बढ़े। कहा कि राम तुम्हारा बहुत पराक्रम सुना है। जनक द्वारा दिया गया शिव धनुष भी तुमने तोड़ दिया है। मैं दूसरा धनुष लेकर आया हूं। इसे खींचकर बाण चढ़ाओ। बाण चढ़ाने से तुम्हारे बल का अनुमान लगाकर मैं तुम्हारे साथ द्वंद्व करूंगा। परशुराम का वचन सुनकर दशरथ की हवाइयां उड़ गईं। परन्तु उन्होंने परशुराम से दीनभाव से ही बातचीत की। परशुराम ने फिर राम से ही कहा कि जो धनुष तुमने तोड़ा है, वह शिव का धनुष था किंतु अब जो धनुष मैं लाया हूं वह विष्णु का है। ये दोनों धनुष विश्वकर्मा ने बनाए थे, जिनमें से एक महादेव को दिया गया और दूसरा विष्णु को।
इसके आगे का वर्णन इस प्रकार हैः
तब देवताओं ने ब्रह्मा से आग्रह किया कि नीलकंठ (महादेव) और विष्णु के
गुणावगुण का पता लगाएं। परम श्रेष्ठ ब्रह्मा ने दोनों के बीच वैमनस्य के आशय
को जान लिया। इस स्थिति में नीलकंठ और विष्णु के बीच घमासान युद्ध छिड़
गया। दोनों ही एक-दूसरे को पराजित करना चाहते थे। शिव जी के विकराल धनुष
में शिथिलता आ गई और त्रिनेत्र शिव जाप करने लगे। दोनों महान देवों के देवता
समूह, ऋषियों और चारणों ने अर्चना की और वे शांत हो गए। जब देवताओं ने
यह देखा कि विष्णु के तेज के आगे शिव धनुष शिथिल पड़ गया तो देवताओं ने
विष्णु की श्रेष्ठता मान ली।