72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस प्रकार ब्रह्मा ने महादेव द्वारा अपने प्रति किए गए अन्याय का बदला ले लिया। इस प्रपंच से भी ब्रह्मा विष्णु पर श्रेष्ठता न पा सके। ब्रह्मा का इतना पराभव हुआ कि जो कभी विष्णु को आदेश देते थे, वही ब्रह्मा का सृष्टा कहलाया।
शिव के साथ हुए श्रेष्ठता-संघर्ष में भी ब्रह्मा की वैसी ही गत बनी, इस संदर्भ में भी स्थिति ठीक विपरीत हो गई। कहां तो शिव ब्रह्मा से उत्पन्न हुए और कहां अब शिव ब्रह्मा के सृष्टा बन गए। ब्रह्मा मुक्ति ख्1, के कारण नहीं रहे। वह देवता, जो मोक्ष प्रदान कर सकते थे, शिव थे और मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा की हैसियत शिव और उनके लिंग की एक साधारण भक्त की तरह पूजा करने की हो गई, वह शिव के सेवक हो गए और उनके सारथी ख्2, बने।
अंततोगत्वा, अपनी पुत्री के साथ व्यभिचार करने के आरोप के कारण ब्रह्मा पूजनीय नहीं रहे। भागवत पुराण में इस लांछन का उल्लेख इस प्रकार है-
‘‘हे क्षत्रिय! हमने सुना है कि स्वायंभुव के मन में अपनी अबला और मोहक
पुत्री वाच के प्रति कामुकता जगी, जिसके मन में उनके प्रति कामभाव नहीं
था। ऋषियों और मारीचि के नेतृत्व में अपने पिता के कुकर्म पर, उनके पुत्रों ने
उन्हें फटकारा। तुमने ऐसा कुकर्म किया है, जो तुमसे पहले किसी ने नहीं किया।
न तुम्हारे बाद कोई ऐसा करेगा। क्या तुम्हें विधाता होते हुए अपनी पुत्री से ही
विषयभोग करना था? क्या तुम अपने उन्माद को रोक नहीं सकते थे? अरे विश्व
के गुरु तुम्हारे जैसे गौरवशाली व्यक्ति के लिए यह प्रशंसनीय नहीं है। जिनके
कार्यों की मर्यादा के कारण व्यक्ति को आनन्द प्राप्त होता है जो जिस विष्णु
की महिमा की दीप्ति से यह ब्रह्मांड प्रकाशित होता है, लौ उसी से फूटती है।
उसे विष्णु धर्म परायणता को बनाए रखना चाहिए, अपने पुत्रों के व्यवहार को
देखकर, जो प्रजापतियों के स्वामी से ऐसा कह रहे थे, प्रजापति शर्म से गड़ गए
और अपने शरीर का विखंडन कर दिया। उसके भयानक अवशेष उस क्षेत्र में
फैल गए और वहीं कोहरे के नाम से विख्यात हुआ।’’
ब्रह्मा के विरुद्ध ऐसा अपकर्ष एवं अपमानजनक प्रहार होने से वह चारों खाने चित्त हो गए। इसमें कोई आश्चर्य नहीं। भारत से उनकी उपासना लुप्त हो गई और त्रिमूर्ति में औपचारिक रूप से ही सहभागी रह गए।
ब्रह्मा के मैदान से बाहर होने पर रह गए शिव और विष्णु। ये दोनों भी कभी चैन से नहीं बैठ पाए। दोनों के बीच होड़ और खींचतान जारी रही।
महाभारत म्यूर द्वारा उद्धृत, खंड 4, पृ. 1921
महाभारत म्यूर द्वारा उद्धृत, खंड 4, पृ. 1991