दसवीं पहेली
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शिव और विष्णु उपासकों में पुराणों के माध्यम से एक-दूसरे के विरुद्ध जो प्रचार होता रहा, उसका उदाहरण निम्नांकित से देखा जा सकता है।
विष्णु से वैदिक देवता सूर्य का और शिव भक्त शिव से अग्नि का संबंध जोड़ते हैं। इसका आशय यह प्रकट करना था कि यदि विष्णु का उदभव वैदिक है तो शिव का उद्गम भी वैदिक है। जन्म के आधार पर कोई भी एक-दूसरे से घटकर नहीं है।
शिव विष्णु से बड़े हों और विष्णु कम न हों। विष्णु के सहस्त्र ख्1, नाम हैं तो शिव के भी सहस्त्र नाम होने चाहिए और ऐसा ही हुआ ख्2, ।
विष्णु के चार चिह्न हैं। इसलिए शिव के भी होने चाहिए। वे हैं - 1. जटा से बहती गंगा, 2. चन्द्रचूड़, 3. नाग और 4. जटाजूट।
एक मात्र क्षेत्र है, अवतार जहां शिव विष्णु की बराबरी में नहीं हैं। इसका कारण यह नहीं है कि उनकी इच्छा बाजी मार लेने की नहीं थी। परन्तु दार्शनिक दृष्टि से शिव के मार्ग में अवतार संबंधी एक अवरोध था शिव और विष्णु के उपासकों में परमानन्द की अवधारणा के संबंध में मौलिक मतभेद हैं। यह श्री अय्यर ने स्पष्ट किया हैः
‘‘शैवों को उद्देश्य है दैहिक और मानसिक बंधनों से मुक्ति और उनका पूर्ण उत्सर्ग। इसलिए वे शिव को अक्षय मानते हैं अर्थात् जो कभी नष्ट नहीं होता अपितु संपूर्ण जगत का संहार करता है। इसी कारण रुद्र को महाकाल कहा जाता है। किसी व्यक्ति के आध्यात्मिक ज्ञान की चरमसीमा पर परम शिव से उसका भेद मिट जाता है, वह अपने भौतिक शरीर, मन, सुख, और दुख और कर्त्तव्य से ज्ञानातीत हो जाता है। वह शिव में सयुज्य हो जाता है। इस स्थिति में वह स्वयं में और शिव में भेद करना भूल जाता है। जब तक वह इस स्थिति को नहीं पहुंचता, वह अपूर्ण है चाहे वह कितना भी शुद्ध कितना ही योग्य क्यों न हो। सयुज्य तक पहुंचने हेतु जो भी पात्र हैं, वे मात्र सालोक्य, सामीप्य और सारूप्य का गौण पद ही पाते हैं। यही कारण है कि अवतार का सिद्धांत शैवों को आकर्षित नहीं कर पाया। अवतार के रूप में भगवान सीमित हो जाता है अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो कदाचित अपने को तो बंधन मुक्त कर लेता है परन्तु मुक्त को मुक्त नहीं कर सकता। वैष्णवों का मत भिन्न है। परमपद के संबंध में उनकी स्पष्ट अवधारणा है। हमें परमात्मा से एकाकार होना है। इसके बावजूद हमें उसकी चेतना रहनी चाहिए। उसे ब्रह्मलीन होना है। इससे ब्रह्माण्ड की अक्षयता के रूप में सत्य का एक अन्य पक्ष
देखें विष्णु सहस्त्रनाम।
पद्मपुराण में उल्लिखित है।
वही।