74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माना जाए। दूसरे शब्दों में वह ब्रह्मांड के क्षय में आस्था नहीं रखते क्योंकि उसका परम पुरुष से भेद विभेद नहीं है। बल्कि वे ब्रह्मांड के पालन के पक्ष में हैं जो प्रकट पुरुष की पहचान से न कम है न ज्यादा। यही कारण है विष्णु को पालनहार कहा गया है। अंततोगत्वा यही भेद है जिससे सत्य का दर्शन होता है। शैव विश्व को दुःख और दारुण का पाश मानते हैं। (इससे सभी को पशु बनना पड़ता है) जिसको तोड़ा जाना चाहिए और उसका संहार होना चाहिए। वैष्णव इसे पुरुष की महानता का प्रमाण मानते हैं और इसके पालन के पक्ष में हैं। शैव निराशावाद अथवा दुखवाद के कारण धर्मसूत्रों के प्रति आस्थावान नहीं हैं। न वे अर्थशास्त्र और अन्य ग्रंथों को ही मानते हैं जो विश्व के संचालन और कल्याण के लिए बना दिए गए हैं। वे पुष्टिमार्गी नहीं हें। वे नियमों और परम्पराओं की अवज्ञा करते हैं। किसी परम शैव के लिए जाति-बंधन खण्डनीय हैं। हां, वे निसंदेह उसका पालन कर सकते हैं जो परिपक्व नहीं है। वह समाज के उन्हीं लोगों का सम्मान करते हैं और उनके विस्तार के पक्ष में हैं जो चाहे किसी भी जाति के हों, परन्तु शिव के साथ सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य और सयोज्य हों। दूसरी ओर वैष्णवों की रुचि सभी नियमों के पालन में है जिससे विश्व का कल्याण होता हो। यदि ध र्म का क्षय होता है तो विश्व का भी क्षय होगा और विश्व का क्षय नहीं होना चाहिए क्योंकि यह पुरुष के अर्न्तयामी होने का लक्षण है। यह उनका कर्म है कि धर्म की रक्षा हो। यदि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है तो विष्णु स्वयं ठीक करते हैं। इसलिए वे अवतार धारण कर विश्व में अवतरित होते हैं। परन्तु जब विष्णु धरती पर आते हैं तो दुष्टों का विनाश करते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम जानें कि जो धर्म का क्षय करता है उसे विष्णु का कोप-भाजन बनना पड़ता है। इसी प्रकार शिवभक्तों के लिए जो विधान लिया गया है, उसमें जाति-बंधन अप्रसांगिक है और भक्ति धर्म तक सीमित है। उसके समुचित पालन से भगवान के दर्शन होंगे और अंततोगत्वा, शिव के साथ एकाकार होगा, दूसरे इसे शूद्र नहीं मानते। यह जाति उन्मूलक है और वे सनातन शास्त्रों के अनुरूप नहीं है।’’
शिव की महिमा में किए गए प्रचार के समान ही विष्णु-भक्तों ने उसके खण्डन के लिए प्रचार-तंत्र अपनाया। गंगा ख्1, अवतरण का प्रसंग एक उदाहरण है। शिवभक्त उसकी उत्पत्ति शिव की जटाओं से मानते हैं। परन्तु वैष्णव इसे मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने एक और कथा रच डाली। वैष्णवों के आख्यान के अनुसार पतितपावनी गंगा बैकुण्ठ (विष्णु के निवास) से निकलती है। उसका उद्गम विष्णु के चरणों से है और कैलाश पर आकर वह शिव के मस्तक पर उतरती है। उस कथा के दो
- मूर, हिंदू पेनथियन, पृ. 40-41