दसवीं पहेली: ब्राह्मणों ने हिंदू देवताओं को एक-दूसरे से क्यों लड़ाया? - Page 90

दसवीं पहेली

75

निष्कर्ष हैं। प्रथम यह कि गंगा का उद्गम विष्णु के चरणों से है, शिव की जटा से नहीं। फिर शिव का पद विष्णु से नीचा है क्योंकि उनके मस्तक पर गंगा की धार विष्णु के चरणों से गिरती है।

दूसरा उदाहरण देवों और असुरों द्वारा सागर-मंथन का है। उन्होंने मंदराचल पर्वत को मथानी और शेष नाग को रस्सी बनाया। विष्णु ने कूर्म अवतार लिया, फिर पृथ्वी को अपनी पीठ पर धारण किया और मंथन के समय उसके स्पादन को नियंत्रित किया है।

यह कथा विष्णु की महिमा बढ़ाने के लिए रची गई है। शिव का स्थान इसमें गौण। इसके अनुसार समुद्र-तल से चौदह रत्न निकले। इनमें से हलाहल एक था। जब तक कोई इस हलाहल का पान न करता यह समस्त विश्व को नष्ट कर सकता था। शिव ही उसके पान के लिए तत्पर हुए। इससे यह संकेत मिलता है कि विष्णु द्वारा दोनों विरोधी समूहों, देव और असुरों को सागर-मंथन की अनुमति देकर विश्व के विनाश का द्वार खोल दिया था और अविवेकपूर्ण कार्य किया था। शिव की महिमा बताई गई है कि उन्होंने विषपान करके विष्णु की मूर्खता से होने वाले अनिष्ट से विश्व को बचा लिया।

तीसरा उदाहरण भी यह प्रकट करता है कि विष्णु मूर्ख थे और शिव ने ही अपनी विलक्षण बुद्धिमत्ता और पराक्रम से विष्णु को उनकी मूर्खताओं के परिणाम से त्राण दिलाया। यह कथा अक्रूरासुर ख्1, की है। अक्रूरासुर ऋक्ष के मुख वाला एक राक्षस था। इसके बावजूद वह नियमित रूप से वेद-पाठ करता था और भक्तिकर्म करता था। विष्णु उससे अत्यंत प्रसन्न थे और उसे मन चाहा वरदान देने का वचन दे डाला। अक्रूरासुर ने वर मांगा कि त्रिलोक में उपस्थित कोई प्राणी उसके प्राण नहीं ले सके। विष्णु मान गए। परन्तु वह इतना ढीठ हो गया कि जब उसने देवताओं को त्रास दिया तो उन्होंने उसके समक्ष समर्पण कर दिया और वह विश्व का शासक बन बैठा। असुर के अत्याचारों से लाचार विष्णु काली तट पर चिंतित बैठे थे। उनका रोष स्पष्ट दिख रहा था। उनकी आंखों के सामने इस आकार का जीव प्रकट हुआ, जो पहले त्रिलोक में विद्यमान नहीं था। वह रौद्ररूपी महादेव थे जिन्होंने क्षण भर में विष्णु को त्राण दिलाया।

इसके प्रतिरोध में भस्मासुर की कथा प्रचलित हुई कि शिव औधड़ (मूर्ख) हैं और विष्णु ने उनकी करतूत से उन्हें बचाया। भस्मासुर ने शिव को एक वरदान पाने के लिए प्रसन्न कर लिया। वरदान यह था कि भस्मासुर जिसके भी सिर पर हाथ

  1. यह कहानी विष्णु आगम में कही जाती है और मूर की ‘हिंदू पेनथियन’ में उद्धृत है, पृ. 19-20