76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
फिरायेगा, वह भस्म हो जायेगा। शिव ने वरदान दे दिया। भस्मासुर ने शिव के वरदान से उन्हें ही भस्म करने की ठानी। शिव सिर पर पांव धरकर भागे और विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और भस्मासुर के पास गए। वह उन्हें देखकर आसक्त हो गया। मोहिनी रूपी विष्णु ने कहा कि वह एक शर्त पर उनकी हो जाएगी कि जैसे-जैसे वह करे वैसे ही भस्मासुर करे, विष्णु ने इस प्रकार भस्मासुर का हाथ उसके सिर पर रखवा दिया। परिणाम यह निकला कि भस्मासुर का काम तमाम हो गया और विष्णु को यह श्रेय मिला कि उन्होंने शिव को उनकी मूर्खता के कारण संभावित विनाश से बचा लिया।
क्या ईश (महादेव) किसी अन्य दृष्ठि से भी कार्यों का कारण है? हमने यह नहीं सुना है कि किसी व्यक्ति के लिंग की दूसरे व्यक्ति और देवता पूजा करें। आप बताएं कि क्या आपने कहीं सुना है कि शिव के सिवाय किसी अन्य के लिंग की पूजा की जाती है अथवा पहले भी कभी देवताओं ने की है। जिसके लिंग की ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र देवताओं सहित निरंतर पूजा करते हैं। इस प्रकार शिव सर्वोच्च है। जातकों में न तो कमल-चिह्न (ब्रह्मा का), न ही चक्र (विष्णु का) और न ही वज्र (इन्द्र का) होता है बल्कि उनमें स्त्री पुरुष के अंग होते हैं। इस प्रकार सारी संतानों का दाता महेश्वर है। सभी नारियां देवी से उत्पन्न हैं, उनमें नारी के अंग हैं और पुरुषों में शिवलिंग विद्यमान रहता है। चराचर में से एक भी ढूंढ दो। सब जान लीजिए जो पुरुष हैं वे ईश हैं जो नारी हैं, वे उमा हैं। इस प्रकार सारा चराचर विश्व इन दो में से निकला है।
यूनानी दार्शनिक जैनोफेन्स इस बात पर बल देते हैं कि बहुदेववाद अमान्य है और इसमें विरोधाभास है इसलिए एकेश्वरवाद ही सत्य है। दार्शनिक कसौटी पर परखने से जैनोफेन्स का विचार सही हो सकता है। परन्तु ऐतिहासिक दृष्टिकोण से दोनों स्वाभाविक हैं। जहां एक ही सम्प्रदाय का समाज है वहां बहुदेववाद स्वाभाविक और आवश्यक है। क्योंकि प्रत्येक प्राचीन सम्प्रदाय में न केवल भिन्न व्यक्ति होते हैं बल्कि उनके विविध भगवान भी होते हैं। विभिन्न समुदायों का विलय और समुच्चय सिवा इसके संभव नहीं कि उनके भगवान को दूसरे भी स्वीकार करें। इस प्रकार बहुदेववाद पनपा।
निष्कर्ष निकलता है कि हिंदुओं में अनेक भगवानों का अस्तित्व ठीक ही है क्योंकि हिंदू समाज अनेक कबीलों-सम्प्रदायों का जमघट है जिनके अलग-अलग देवता हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि देवता आपस में संघर्षरत परस्पर दोषारोपण और वंदना में निरत रहे। यह सब कुछ लज्जा और क्षुद्रता की बात है। इसका स्पष्टीकरण वांछित है।