ग्यारहवीं पहेली: ब्राह्मणों ने देवताओं का उत्थान-पतन क्यों किया? - Page 92

ग्यारहवीं पहेली

ब्राह्मणों ने देवताओं का उत्थान-पतन क्यों किया?

हिंदुओं को मूर्तिपूजक होने का दोषी ठहराया जाता है। परन्तु मूर्तिपूजा में कोई हर्ज नहीं। मूर्ति बनाना और बनाना और देवताओं के चित्र बनाना समान है और यदि चित्र बनाने पर कोई आपत्ति नहीं है तो मूर्ति बनाने पर क्या आपत्ति हो सकती है? हिंदुओं की मूर्तिपूजा पर वास्तविक आपत्ति यह है कि यह मात्र चित्रकारी नहीं है, मूर्ति की मात्र रचना नहीं है यह सब उससे अधिक है। हिंदू मूर्ति प्राणवान बताई जाती है और वही सब कार्य करती है जो मनुष्य करता है। प्राणप्रतिष्ठा से उनमें जान डाल दी जाती है। बौद्ध भी मूर्तिपूजक हैं। परन्तु जिस मूर्ति अथवा चित्र की वे पूजा करते हैं, वे मात्र प्रतीक हैं। ब्राह्मणों ने हिंदू देवी-देवताओं को जीवंत घोषित क्यों किया? यह एक प्रश्न है जिसके उत्तर की आवश्यकता है। परन्तु इस अध्याय में इस उत्तर की गुंजाइश नहीं है।

हिंदुओं पर जो दूसरा आरोप लगाया जाता है वह है- बहुदेववादी होने का अर्थात् वे बहुत से देवताओं के पूजक हैं। इस संबंध में भी केवल हिंदू ही इस आरोप से ग्रस्त नहीं हैं। अन्य समाजों में भी बहुदेववाद का प्रचलन है। हम केवल दो को गिनाते हैं। रोमन और यूनानी भी मूलतः बहुदेववादी हैं। वे भी अनेक देवताओं को मानते हैं। इसलिए इस लांछन में कोई दम नहीं।

हिंदुओं पर जो बड़ा आरोप लगाया जा सकता है, अधिकांश लोग उससे परिचित नहीं। वह है कि हिंदू अपने देवों की उपासना में अटल विश्वासी नहीं। उनमें एक देवता के प्रति आस्था श्रद्धा का अभाव है। हिंदू देवताओं के इतिहास में यह सामान्य बात है कि कुछ देवताओं की कभी उपासना होती रही और कालांतर में बंद हो

लेखक द्वारा स्व हस्तलिपि में संशोधित यह तैतालीस पृष्ठ की पाण्डुलिपि प्राप्त हुई थी। अंतिम पैरा लेखक ने स्वयं कलम से लिखा था। इस अध्याय का मूल शीर्षक ‘राइज एंड फाल आफ दि गाड्स’ था। इस शीर्षक को लेखक ने नीली स्याही की कलम से काट दिया था जैसी कि आम तौर पर लेखकीय परंपरा है। - संपादक