78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गई और उन देवताओं को कचरे में डाल दिया गया। बिल्कुल ही नए देवताओं की मान्यता हो गई और पूर्ण भक्ति-भाव से उनकी उपासना होने लगी। फिर ये देव भी अप्रासंगिक हो गए और देवताओं के बीच संघर्ष का क्रम चल रहा है। यह ऐसी बात है जो विश्व के किसी अन्य सम्प्रदाय में दृष्टिगोचर नहीं।
इस कथन को बिना आपत्ति के स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि हिंदू अपने देवताओं के विषय में इतने हल्के विचार रखते थे। कुछ उदाहरण देना आवश्यक है। सौभाग्य से उनकी भरमार है। आजकल हिंदुओं के चार देवता है। (1) शिव, (2) विष्णु, (3) राम, और (4) कृष्ण। प्रश्न यह है कि क्या हिंदुओं के यही देवता हैं जिनकी आदिकाल से पूजा-अर्चना होती आ रही है?
हिंदू देव-कुल में देवों की संख्या सर्वाधिक है। संख्या की दृष्टि से संसार का कोई धर्म इस देवकुल की बारबरी नहीं कर सकता। ऋग्वेद-काल में देवताओं की विशाल संख्या थी। दो स्थानों पर ऋग्वेद ख्1, में कहा गया है तीन हजार तीन तीन सौ नौ देवता हैं (पता नहीं किस कारण से यह संख्या घटकर तैंतीस ख्2, रह गई)। यह एक उल्लेखनीय ”ास है। उसके बावजूद तैंतीस देवताओं का हिन्दू देव-कुल सबसे विशाल है।
शतपथ ब्राह्मण ख्3, में तैंतीस देवों की व्याख्या इस प्रकार की गई है- आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और पृथ्वी तथा स्वर्ग।
उनकी संख्या से बढ़कर प्रश्न उनके परस्पर संबंधों का है। क्या पद की दृष्टि से उनमें कोई भेद था? ऋग्वेद में एक मंत्र है कि आदर और स्थान की दृष्टि से इनके दो वर्ग हैं, एक बड़ा और छोटा तथा दूसरा नवीन और प्राचीन।
यह विचार ऋग्वेद की प्राचीन मान्यता से भिन्न लगता है। पुराना नियम इस प्रकार हैः
‘‘हे देवताओं! तुम में से न कोई छोटा है, न नवीन, तुम सब महान हो’’ं। प्रोफेसर मैक्मूलर का भी यही निष्कर्ष हैः
‘‘जब इन देवों का आह्वान किया गया, उनकी शक्ति दूसरे से सीमित नहीं समझी
गई थी न वे एक दूसरे से पद में ही श्रेष्ठ अथवा हीन थे। उपासक की दृष्टि में
एक देव अन्य देवों के समान था। उसमें एक समय यथार्थ देवत्य समझा गया।
ऋग्वेद 3, 99ः10 52ः6, वाज सं 33.7, म्यूर खण्ड 5, पृष्ठ 12
ऋग्वेद 1, 139_ 2ए3_ 6ए9_ 1_ 8,30. 2_ 8,35. 3 म्यूर 5. पृ. 10
एस.बी.ई. खंड 4ः5, 7,2_ म्यूर 5, पृष्ठ 2