ग्यारहवीं पहेली
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गुत्थी को सुलझाने का अवसर नहीं है। इतना कहना ही पर्याप्त है कि हिंदुओं के देवताओं को देवत्व छिन जाना एक अनहोनी बात है।
दूसरा प्रश्न भी रहस्य की बात है। नए देवों कृष्ण, विष्णु, शिव और राम की उपासना का महत्व ब्राह्मणों के साहित्य में ने केवल भरा पड़ा है अपितु उत्ताल तरंगें भर रहा है। परन्तु उनके साहित्य में नए देवों के उदय का कोई लेखा-जोखा नहीं मिलता। यह रहत्य ही है कि ये नए देवता कहां से आ धमके? उस समय रहस्य और गहरा जाता है जब हम पाते हैं कि इनमें से कुछ तो निश्चय ही वेदद्रोही हैं।
हम शिव की बात लेते हैं कि शिव मूल रूप से वेदद्रोही देवता थे, यह बिल्कुल स्पष्ट है। भागवत पुराण में दो प्रसंग हैं और महाभारत में भी, जो इस विषय पर प्रकाश डालते हैं। पहले प्रसंग से पता चलता है कि उनमें और उनके श्वसुर दक्ष में कैसी शत्रुता उपजी। ऐसा लगता है कि प्रजापतियों के यज्ञ में देवता और ऋषि एकत्र हुए। दक्ष के आने पर ब्रह्मा और शिव को छोड़कर सभी उपस्थित जन उनके अभिवादन में खड़े हो गए। दक्ष ब्रह्मा को प्रणाम करके उनके कहने पर बैठ गए, परन्तु वह शिव के व्यवहार पर क्षुब्ध थे। उन्होंने शिव ख्1, से कहाः
‘‘शिव को पहले बैठा देखकर दक्ष सम्मान का लोभ संवरण न कर सके और
उन पर इस प्रकार तिरछी नजर डाली जैसे उन्हें खा ही जाएंगे। फिर बोले ‘‘हे
ब्राह्मणों, ऋषियों, देवताओं सहित अग्नि, सुनो! मैं अनजाने में नहीं, न भावावेश
ही में आकर यह बता रहा हूं कि एक गुणी व्यक्ति के क्या लक्षण हैं। परंतु यह
निर्लज्ज शिव विश्वनियंता की अवमानना करता है। यह कितना हठधर्मी है। इसने
शिष्टाचार का उल्लंघन किया है। इसने गुणवान व्यक्तियों की भांति मेरे शिष्य की
स्थिति प्राप्त कर ली। ब्राह्मणों और अग्न की साक्षी में इसने मेरी सावित्री जैसी
पुत्री का पाणिग्रहण किया। इस बन्दर जैसी आंखों वाले ने मेरी मृगनयनी पुत्री
को प्राप्त किया। उसने मेरे अभिवादन में एक शब्द भी नहीं बोला जबकि इसे
अभिवादन के लिए उठना चाहिए था। मैंने अनमने होकर ही सही, अपनी पुत्री
इस क्षुद्र और दंभी को सौंप दी जिसने कुसंस्कारों की सारी सीमाएं तोड़ रखी हैं।
जैसे ‘यह शूद्रों को वेद मंत्र सुनाता है। यह श्मशानों में घूमता है। भूत-पिशाचों
के बीच रहता है। पागलों जैसा नंगा, बाल बिखेरे, हंसता-रोता फिरता है, श्मशान
की राख शरीर पर मलता है, नरमुण्ड पहनता है। मानव की हड्डियों के आभूषण
पहनता है। बनता शिव (शुभ) है परन्तु सच में अशिव (अशुभ) है, पागल ही
इसके संगी-साथी हैं, भूत इसके मित्र हैं, जो अंधकार-प्रिय हैं। काश! मैंने
अपनी गुणवंती पुत्री ब्रह्मा के कहने में आकर ऐसे क्रोधोन्मत्तों के दुष्टात्मा
स्वामी को, जिनकी शुद्धता नष्ट हो चुकी है, न दी होती। शिव को ऐसे दुर्वचन
- भागवत पुराण, अध्याय 4, पृ. 379-80