ग्यारहवीं पहेली: ब्राह्मणों ने देवताओं का उत्थान-पतन क्यों किया? - Page 99

84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बोल कर, जिसका उन्होंने कोई प्रतिवाद नहीं किया, दक्ष ने उन्हें चिढ़ाया और

जल हाथ में लेकर उन्हें शाप देना आरम्भ कियाः ‘‘यह शिव सभी देवी-देवताओं

में निकृष्ट हो। इसे देवताओं की पूजा के समय इन्द्र, उपेन्द्र (विष्णु) और अन्य

देवों के समान स्थान प्राप्त न हो’’। अपना श्राप देकर दक्ष चले गए।

श्वसुर-दामाद के बीच वैमनस्य जारी रहा। ब्रह्मा ने दक्ष को प्रजापतयों के प्रमुख का पद प्रदान किया तो उन्होंने बृहस्पतिस्व यज्ञ करने की ठानी। जब पार्वती ने देखा कि सभी देव सपत्नीक यज्ञ में जा रहे हैं जो पार्वती ने शिव से उनके साथ चलने की जिद की। उनके पिता ने शिव का जो अपमान किया था, उन्होंने पार्वती को उसकी याद दिलायी और यज्ञ में जाने से मना किया। परन्तु वह अपने संबंधियों से मिलने को आतुर थीं। उसने सब बातों की अवहेलना कर दी और चली गयी। जब उन्होंने अपने पिता दक्ष को देखा तो अपने पति को अपमानित करने पर पिता की भर्त्सना की और यह ध मकी दी कि उन्हें अपने माता-पता से जो देह प्राप्त हुई है, उसे वे अग्नि को समर्पित कर देगी। फिर वे अग्नि में कूद पड़ीं। शिव के जो गण पार्वती के साथ गए थे, जब उन्होंने यह देखा तो वे दक्ष का वध करने का लपके। परन्तु भृगु ने यजुस का मंत्रोपचार कर दक्षिणाग्नि की आहुति दी, जो यज्ञ में बाधा डालने वालों को नष्ट करने के लिए दी जाती है। परिणामस्वरूप ऋभु नाम के हजारों तेजस्वी देवता प्रकट हो गए। उन्होंने अपनी तपस्या के प्रताप से चन्द्रलोक प्राप्त किया था। उन ब्रह्मतेज सम्पन्न देवताओं ने जलती हुई लकड़यों से आक्रमण किया तो समस्त यज्ञ विघ्नकर्त्ता भाग लिए। ऋभुओं ने उनके पार्षदों को भगा दिया। जब शिव ने देवी सती के प्राण त्याग की बात सुनी तब उन्हें बड़ा ही क्रोध हुआ। उन्होंने अपने सिर की जटाओं में से क्रोधित होकर केशों का एक गुच्छा उखाड़ा जिसमें से एक विकराल राक्षस प्रकट हुआ, जस दक्ष और उसके यज्ञ को खत्म करने का आदेश दिया। यह राक्षस शिव के अनुयायी विकराल भूत-प्रेत और पिशाचगणों को लेकर उनकी (शिव की) आज्ञा को शिरोधार्य करके यज्ञ-मंडप की ओर दौड़ा। उन्होंने यज्ञ-मंडप में क्या कुहराम मचाया और शिव-आदेश का किस प्रकार अनुपालन किया, इसका भागवत पुराण में ख्1, उल्लेख मिलता है ख्1,

‘‘कुछ ने यज्ञशाला के पवित्र यज्ञ-पात्रों को तोड़ डाला, कुछ ने हवनकुंड की अग्नि

बुझा दी, कुछ ने यज्ञकुंडों को मूत्र से दूषित कर दिया, किसी ने यजमान गृह ही

सीमाओं को रौंद डाला, कुछ ने मुनियों को तंग किया, किसी ने ऋषि पत्नियों को

डराया-धमकाया। किसी ने भयभीत देवताओं को धर दबोचा जो निकट ही विराजमान

थे, कुछ भाग खड़े हुए....। भवदेव (शिव) ने भृगु की दाढ़ी नौंच ली जो हाथ

में यज्ञ की करछुल लिए हवन कर रहे थे और जिन्होंने प्रजापतियों की सभा में

  1. म्यूर द्वारा उद्धृत, खंड 4, पृ. 383-84