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अराजकता कैसे जायज है?

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गांव में इस प्रकार के विभाजन के बारे में दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि ये समूह स्वयं में अलग-अलग एक इकाई होते हैं और कोई भी एक-दूसरे को अपने में शामिल नहीं करता। यह ठीक ही कहा गया है कि अमरीका या यूरोप में रहने वाला व्यक्ति विभिन्न प्रकार के समूहों का होता है और वह इनमें से अधिकांश का सदस्य बनता है। वह निश्चय ही किसी एक परिवार में जन्म लेता है, लेकिन वह उस परिवार में सारी जिंदगी रहने के बजाय, जब तक चाहे तभी तक उस परिवार में रहता है। वह कोई भी व्यवसाय या कोई भी निवास स्थान चुन सकता है, किसी के भी साथ विवाह कर सकता है, किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो सकता है और वह किसी दूसरे के द्वारा किए गए कार्य के बजाय केवल अपने कार्यों के प्रति उत्तरदायी होता है। वह पूर्ण अर्थ में एक व्यक्ति होता है, क्योंकि उसके सभी संबंध और सभी कार्य उसी के द्व ारा अपने लिए निर्धारित होते हैं। लेकिन स्पृश्य या अस्पृश्य व्यक्ति किसी भी अर्थ में ‘व्यक्ति’ नहीं होता क्योंकि उसके सभी या लगभग सभी संबंध तभी निश्चित हो जाते हैं, जब उसका जन्म किसी वर्ग विशेष में हो जाता है। उसका व्यवसाय, उसका निवास, उसके देवी-देवता, उसकी राजनीति आदि सभी कुछ उस वर्ग द्वारा उसके लिए निश्चित हो जाते हैं, जिसमें उसका जन्म हो गया होता है। ये स्पृश्य और अस्पृश्य व्यक्ति एक-दूसरे से जब मिलते हैं, तो इस तरह नहीं मिलते, जैसे एक इंसान दूसरे इंसान से मिल रहा होता है, बल्कि वे ऐसे मिलते है, जैसे एक समुदाय का व्यक्ति दूसरे समुदाय से या दो विभिन्न राष्ट्रों के व्यक्ति आपस में मिल रहे हों।

इस तथ्य का गांवों में स्पृश्यों और अस्पृश्यों के आपसी संबंधों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। यह संबंध उन्हीं संबंधों के सदृश होता है, जैसे आदिम-काल में दो विभिन्न कबीलों के बीच होते थे। आदि समाज में एक कबीले के व्यक्ति यह दावा करते थे कि वही हर चीज के अधिकारी हैं, और बाहरी व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं होता। एक मेहमान की तरह बाहरी व्यक्ति के ऊपर कृपा तो की जा सकती है, लेकिन वह अपने कबीले के अलावा किसी दूसरे कबीले में न्याय की मांग नहीं कर सकता। एक कबीले के साथ दूसरे कबीले के संबंध युद्ध या मैत्री के संबंध समझे जाते थे, न कि किसी कानून के संबंध। और जो व्यक्ति किसी कबीले का नहीं होता था, वह ‘बाहरी’ समझा जाता था-असलियत में और नाम से भी। इसलिए बाहरी व्यक्तियों के विरुद्ध कानून की अनदेखी कर व्यवहार करना कानून में जायज था। चूंकि अस्पृश्य व्यक्ति स्पृश्यों के वर्ग का सदस्य नहीं है, इसलिए वह बाहरी व्यक्ति है। उससे उनका कोई संबंध नहीं है। वह कानून