86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के लाभ से बहिष्कृत व्यक्ति है। वह न्याय के लिए कोई दावा नहीं कर सकता है। वह किसी प्रकार के अधिकार की मांग नहीं कर सकता, जिसे मानना प्रत्येक स्पृश्य व्यक्ति के लिए अनिवार्य है।
तीसरी बात जो ध्यान में रखनी है, वह यह है कि स्पृश्यों और अस्पृश्यों के बीच आपसी संबंध निश्चित होते हैं। यह हैसियत का सवाल बन गया है। अस्पृश्यों को निश्चत रूप से स्पृश्यों के मुकाबले हीन स्थिति में रखा गया है। यह हीनता सामाजिक आचार-विचार संहिता में वर्णित है, जो अस्पृश्यों को अनिवार्यतः स्वीकार करनी चाहिए। और आचार-विचार संहिता कैसी है, वह बताया जा चुका है। अस्पृश्य इस संहिता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। यह मानने के लिए तैयार नहीं कि जिसके पास लाठी भैंस भी उसी की है। अस्पृश्य चाहते हैं कि अस्पृश्यों के साथ उनके संबंध किसी सहमति पर आधारित हों। लेकिन स्पृश्य चाहते हैं कि अस्पृश्य समाज में अपनी हैसियत के नियमों के अनुसार जीवन-यापन करें और उससे ऊपर न उठें। इस तरह गांव के दो वर्ग, अर्थात् स्पृश्य और अस्पृश्य उस व्यवस्था को पुनः व्यवस्थित करने के लिए संघर्ष्ारत् हैं, जिसे स्पृश्य समझते हैं कि यह हमेशा के लिए निर्णीत हो चुकी है। यह संघर्ष इस प्रश्न को लेकर है कि इस संबंध का आधार क्या हो? क्या उसका आधार कोई समझौता हो या उसका आधार हैसियल को माना जाए।
इससे कुछ बड़े रोचक प्रश्न पैदा होते हैं। अस्पृश्यों को निम्नतम जातियों का और निम्न दर्जा क्यों दिया गया? हिंदुओं में उनके प्रति इतना विरोध और अनादर का भाव कैसे पैदा हो गया? हिंदू लोग अस्पृश्यों का दमन करने में मनमाना आचरण क्यों करते हैं, मानो उनका यह आचरण कानून सम्मत हो।
इन सवालों का सटीक उत्तर पाने के लिए हमें हिंदुओं के विधि-विधान पर विचार करना होगा। हिंदू विधान के नियमों की पर्याप्त जानकारी के बिना इस प्रश्न का कोई संतोषजनक उत्तर मिलना असंभव है। हमें अपने प्रयोजन के लिए समस्त हिंदू कानून और उसकी प्रत्येक शाखा को ध्यान में रखना आवश्यक नहीं। हिंदू कानून की उस शाखा का ज्ञान होना ही यथेष् है, जिसे वैयक्तिक विधि या जिसे अगर गैर-तकनीकी भाषा में कहा जाए तो हम हिंदू कानून का वह भाग कहते हैं, जो हैसियत, अधिकार, कर्तव्य या सामर्थ्य में अंतर से संबंधित है।
इसलिए यहां हिंदू कानून के नियमों की तालिका प्रस्तुत करने का विचार है, जो वैयक्तिक कानून से संबंधित है। ये नियम मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, विष्णु, कात्यायन आदि की स्मृतियों आदि से संकलित किए गए हैं। ये कुछ ऐसे प्रमुख