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अराजकता कैसे जायज है?
अब तक जो कुछ कहा गया है, उससे दो बातें अवश्य स्पष् हो गई होंगी, जिन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए। पहली, स्पृश्यों और अस्पृश्यों के बीच अकाट्य भेद और दूसरी, इन दोनों के बीच एक-दूसरे के प्रति गंभीर रूप से प्रतिकूल होने की भावना।
हर गांव में दो हिस्से होते हैं, स्पृश्यों के घर और अस्पृश्यों के घर। भौगोलिक दृषि् से ये बिल्कुल अलग होते हैं। दोनों के बीच में काफी दूरी होती है। किसी भी दशा में दोनों प्रकार के घर अगल-बगल नहीं होते और न ये पास ही होते हैं। अस्पृश्यों के घर उनकी जाति के नाम से जाने जाते हैं, जैसे महारवाड़ा, मांगवाड़ा, चमरोटी, खाटिकाना आदि। राजस्व खातों और डाकखानों में अस्पृश्यों के घर कानूनन गांव का हिस्सा माने जाते हैं, लेकिन हकीकत में गांव से अलग होते हैं। गांव में रहने वाला हिंदू जब गांव का जिक्र करता है तो उसका आशय उसमें सवर्ण हिंदू निवासियों को शामिल करना होता है, जो स्थानीय रूप से वहां रहते हैं। इसी तरह जब कोई अस्पृश्य गांव की बात करता है तो उसका आशय उस गांव में से अस्पृश्यों और उनके घरों से रहित गांव से होता है। यह जरूरी नहीं कि इन दोनों को मिलाकर ही गांव बने। इस तरह हर गांव में स्पृश्य और अस्पृश्य नाम से अलग-अलग समूह होते हैं। दोनों के बीच कोई समानता नहीं होती। यह पहली बात है, जो ध्यान में रखी जानी चाहिए।
इस निबंध के मूल अंग्रेजी पाठ की प्रति श्री एस. एस. रेगे से प्राप्त हुई है। चूंकि इसका शीर्षक पिछले अध्याय के समानुरूप है और इसकी विषय-वस्तु उक्त अध्याय के क्रम में जान पड़ती है, इसलिए इसे यहां संकलित किया गया है-संपादक