अराजकता कैसे जायज है?
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विधि-निर्माता हैं, जिन्हें हिंदू विधि के निर्माण के क्षेत्र में प्रमाण स्वरूप मानते हैं। इन नियमों का यथावत उल्लेख चाहे कितना ही रोचक क्यों न हो, लेकिन इससे उस व्यक्ति को कुछ भी सहायता नहीं मिलेगी जो इनको हिंदुओं के वैयक्तिक कानून की बुनियादी जानकारी के लिए उलटता-पुलटता है। इस प्रयोजन के लिए इनको उद्धत करना यथेष् नहीं है। स्पतष्तः कुछ क्रम निश्चित करना आवश्यक है, इसलिए उन्हें कुछ शीर्षकों में बांटा गया है। यह सारी सामग्री संक्षिप्त कर दी गई है, जो खंडों में विभक्त है और प्रत्येक विशिष् विषय के अनुसार है।
विभिन्न वर्गः उनकी उत्पत्ति और कर्म
यह ब्रह्मांड तम पुंज के रूप में, अज्ञात, लक्षणहीन, प्रमाणादि तर्कों से परे, अज्ञेय, पूर्ण निमज्जित था, जैसे प्रगाढ़ निद्रा में हो- (मनु 1.5.)
तब स्वयंभू जो अगम थे, किंतु आकाशादि महाभूतों को प्रकट करते हुए गोचर रूप में दुर्दम्य सृजनशक्ति सहित हो, अंधकार को दूर करते हुए प्रकट हुए- (वही 1.6.)
तीनों लोकों की संवृद्धि के लिए ब्रह्मा ने अपने मुख, बाहु, उरु और चरणों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र की सृषि् की-(वही 1.31.)
महातेजस्वी ब्रह्मा ने संपूर्ण सृषि् की रक्षा के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अलग-अलग (कर्म) व्यवसाय निर्धारित किए- (वही 1.87.)
ब्राह्मणों के लिए उन्होंने (वेदों को) पढ़ना और पढ़ाना, अपने तथा दूसरों के हित के लिए यज्ञ करना और कराना, दान लेना और दान देना, कर्म निर्धारित किए- (वही, 1.88.)
उन्होंने प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, वेदों का अध्ययन करना, विषयों में आसक्ति न रखना, यह क्षत्रियों के कर्तव्य बताए हैं- (मनु, 1.89.)
उन्होंने पशुपालन, दान देना, यज्ञ करना, (वेद) पढ़ना, व्यापार करना, ऋण देना और खेती करना ये वैश्यों के कर्तव्य बताए- (वही, 1.90.)
ब्रह्मा ने शूद्र के लिए एक ही कर्तव्य निर्धारित किया अर्थात् इन अन्य तीन वर्णों की अत्यंत विनम्रतापूर्वक सेवा करना-(वही, 1.91.)
विद्यार्थी, प्रशिक्षणार्थी, वेतन देकर नियुक्त सेवक और चौथे अधिकारी व्यक्ति, इन सभी को श्रमिक समझना चाहिए। जो किसी के घर में जन्म प्राप्त