7. अराजकता कैसे जायज है? - Page 107

92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

  1. जब (उक्त गुणों से युक्त) कोई ब्राह्मण नहीं मिल सकता हो तब राजा को चाहिए कि वह किसी क्षत्रिय या वैश्य को नियुक्त करे जो धर्म में निष्णात हो और राजा को किसी शूद्र को न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने से सतर्क रहना चाहिए- (वही, 6.7.)

  2. इनके अतिरिक्त अन्य के द्वारा (न्यायाधाश के रूप में) जो कुछ किया गया है, वह निश्चित रूप से गलत किया गया समझा जाना चाहिए, चाहे वे (राजा के ही) अधिकारी क्यों न हों और चाह संयोग से इस प्रकार किया गया निर्णय धर्म-गंथों के अनुसार ही क्यों न हो- (वही, 68.)

  3. ब्राह्मण जो अपनी जाति के नाम के कारण ही भरण-पोषण करता है या जो अपने को केवल ब्राह्मण कहता है (चाहे उसका वंश अनिश्चित ही क्यों न हो) वह राजा के अनुरोध पर उसके लिए धर्म का निर्वचप कर सकता है, लेकिन यह कार्य कोई शूद्र कभी नहीं कर सकता- (मनु, 8.20.)

  4. जिस राज्य में उसका राजा दर्शक की भांति केवल देखता रहता है और उसी की ही उपस्थिति में शूद्र न्याय का विचार करता है, वह राज्य उसी प्रकार अधोगति को प्राप्त होता है, जिस प्रकार गाय दलदल में नीचे धंस जाती है- (मनु, 8.21.)

  5. किसी ब्राह्मण को जो कानून को अच्छी तरह जानता है अपने प्रति किसी के द्वारा किए गए अपराध के विषय में राजा से शिकायत करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह अपनी शक्ति से ही उस व्यक्ति को दंडित कर सकता हे, जिसने अपराध किया है- (वही, 9.31.)

  6. उसकी अपनी शक्ति राजा की शक्ति से अधिक होती है, इसलिए ब्राह्मण अपनी शक्ति से ही अपने शत्रुओं को दंड दे सकता है- (वही, 11.32.)

  7. ब्राह्मण के बारे में यह घोषित है कि वह (विश्व का) सृजक, दंडदाता, शिक्षक है और इसलिए वह (सभी सृजित प्राणियों का) उपकारकर्ता है, इसलिए कोई भी व्यक्ति उससे अपभाषण न करे और न उसके विरुद्ध कटूक्ति ही बोले- (वही, 11.35.)