अराजकता कैसे जायज है?
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वर्णों वर्गों में परस्पर संबंध
I
चारों वर्णों में उल्टे क्रम में दासता की अनुमति नहीं है- (नारद, 5.39.)
तीनों वर्णों के लोग दास बन सकते हैं, किंतु ब्राह्मण कभी भी दास नहीं बन सकता। दास-प्रथा तीनों वर्णों अर्थात् क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के मामले में सीधे क्रम में होती है, न कि उलटे क्रम में। शूद्र चारों वर्णों में से किसी का भी दास बन सकता है, वैश्य पहले तीन वर्णों का दास बन सकता है, लेकिन वह शूद्र स्वामी का दास नहीं बन सकता। क्षत्रिय ब्राह्मण या क्षत्रिय स्वामी का दास बन सकता है, किंतु वह वैश्य या शूद्र स्वामी का दास नहीं बन सकता- (कात्यायन, 715-716.)
ब्राह्मण समान वर्ण का होने पर भी किसी ब्राह्मण से उसे अपने दास बनाकर काम नहीं करा सकता। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र समान वर्ण के यहां प्रायः दास बन सकता है, परंतु किसी ब्राह्मण से दास का कार्य कदापि न कराया जाए- (वही, 717-718.)
II
द्विज के प्रथम विवाह के लिए समान जाति की (पत्नी) हो, लेकिन जो दुबारा विवाह करना चाहे तब जातियों के प्रत्यक्ष क्रम के अनुसार एक के बाद दूसरे वर्ण की स्त्री ही सर्वाधिक अनुमोदित है- (मनु, 3.12.)
यह घोषित किया जाता है कि शूद्र स्त्री केवल किसी शूद्र की पत्नी बन सकती है, वह और वैश्य की अपनी जाति (की स्त्री) किसी वैश्य की पत्नी बन सकती है, उक्त दोनों जातियों और क्षत्रिय की अपनी जाति (एक स्त्री) ही किसी क्षत्रिय की पत्नी बन सकती है, उक्त तीनों जातियों और ब्राह्मण की अपनी जाति (की स्त्री) ही किसी ब्राह्मण की पत्नी बन सकती है- (वही, 3.13.)
यदि कोई द्विज अपनी जाति की या अन्य (निम्न जातियों की) स्त्रियों के साथ विवाह कर ले तो उनकी वरीयता, पद और निवास वर्ण के क्रम के अनुसार निश्चित किया जाना चाहिए- (वही, 9.85.)
सभी (द्विज पुरुषों में) केवल समान जाति की स्त्री व्यक्तिगत रूप से अपने पति की सेवा-सुश्रुषा करे और वही उसके यज्ञादि कर्मों में उसकी सहायक होगी, किसी दूसरी जाति की स्त्री नहीं - (वही, 9.86.)