अराजकता कैसे जायज है?
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III
जो अतिथि (स्वेच्छा से) घर आए तब (गृहस्थ को) चाहिए कि वह उसे नियमानुसार आसन और जल तथा भोजन, स्वादिष् व्यंजन सहित अपनी सामर्थ्य के अनुसार दे- (वही, 3.99.)
क्षत्रिय जो ब्राह्मण के घर आता है अतिथि नहीं कहलाता, न वैश्य, न शूद्र न कोई मित्र, न संबंधी और न गुरु- (वही, 3.110.)
ल्ेकिन यदि क्षत्रिय के घर आता है, अतिथि के रूप में ब्राह्मण के घर आए तब ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद (गृहस्थ) अपनी इच्छानुसार उसको भोजन कराए- (वही, 3.111.)
यदि कोई वैश्य और शूद्र भी उसके घर अतिथि के रूप में आए तब वह उसके प्रति दया का भाव प्रदर्शित करते हुए अपने सेवकों के साथ भोजन कराए- (वही, 3.112.)
कर्तव्य-विशेषाधिकार-छूट-अपात्रता
I
जो ब्राह्मण ब्रह्म से मिलन के साधनों पर एकाग्र हैं और अपने कर्तव्यों के पालन में दृढ़ हैं, आजीवन निम्नलिखित छह कर्तव्यों का पालन करेंगे जिनका (वर्णन) उनके उचित क्रम के अनुसार किया गया है- (मनु, 10.74)
प्रत्येक ब्राह्मण के लिए ये छह कर्म (निर्धारित हैं), अध्यापन, अध्ययन, स्वयं के लिए यज्ञ करना, अन्यों के लिए यज्ञ करना, दान देना और दान लेना- (वही, 10.75.)
लेकिन उसके लिए (निर्धारित) छह कर्मों में से तीन कर्म उसकी जीविका के साधन हैं अर्थात् अन्यों के लिए यज्ञ करना, अध्यापन और पवित्र व्यक्तियों से दान ग्रहण करना- (वही, 10.76.)
ब्राह्मण के बाद क्षत्रिय के लिए तीन कर्म, जो ब्राह्मण के लिए अनिवार्य हैं अर्थात् अध्यापन, अन्यों के लिए यज्ञ करना और उसके निमित्त दान ग्रहण करना, वर्जित हैं- (वही, 10.77.)