96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसी प्रकार ये तीनों कर्म वैश्य के लिए वर्जित हैं, यह शाश्वत नियम हैं, क्योंकि मनु ने जो समस्त जीवों के स्वामी (प्रजापति) हैं ये कर्म उक्त दोनों (जातियों के व्यक्तियों के लिए) निर्धारित नहीं किए हैं- (वही, 10.78)
मारने के लिए और फेंक कर मारने के लिए शस्त्रास्त्र धारण करना क्षत्रियों के लिए, व्यापार करना, पशु (पालन) करना और कृषि वैश्यों के लिए जीविकार्थ निर्धारित कर्म हैं, लेकिन उनके कर्तव्य हैं, दान देना, वेदाध्ययन और यज्ञ करना -(वही, 10.79)
सभी व्यवसायों में से ब्राह्मणों के लिए वेद का अध्यापन, क्षत्रिय के लिए रोगों की सुरक्षा करना और वैश्य के लिए व्यापार करना सबसे अधिक उत्तम कर्म हैं- (वही, 10.80.)
ब्राह्मणों की सेवा करना शूद्र के लिए एकमात्र उत्तम कर्म कहा गया है क्योंकि इसके अतिरिक्त वह जो कुछ करेगा, उसका उसे कोई फल नहीं मिलेगा- (वही, 10.123)
लेकिन यदि ब्राह्मण अपने इन विशिष् कर्मों से जिनका अभी उल्लेख किया गया है, अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर सके तब क्षत्रियों के लिए लागू नियम से जीवन-निर्वाह कर सकता है, क्योंकि वह पद के अनुसार उसके बाद आता है- (मनु, 10.81.)
यदि यह पूछा जाए कि अगर वह इन दोनों कर्मों में से कसी भी एक कर्म से अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर सके तब क्या किया जाए तो उत्तर है कि वह वैश्य की जीवन-पद्धति अपना ले, स्वयं खेती करे और पशु-पालन करे- (वही, 10.82)
ज्ीविका के लिए संकट-ग्रस्त होने पर क्षत्रिय इन साधनों से जीविका निर्वाह करे जो वैश्य के लिए वर्जित नहीं हैं- (वही, 10.95.)
अपने कार्यों से जीवन-निर्वाह न कर सकने वाला वैश्य शूद्र की जीवन-पद्धति द्वारा अपना जीवन-निर्वाह करे और यह विचार न करे कि ये कार्य तो (उसके लए) निषिद्ध हैं और जब वह समर्थ हो जाए तब उसे उस कार्य से निवृत्त हो जाना चाहिए- (वही, 10.98.)
लेकिन जब शूद्र को द्विजों से सेवा-कार्य न मिल सके और जब उसकी पत्नी, पुत्रों आदि के भूख से मर जाने की स्थिति आ जाए, तब उसे काठ कर्म द्वारा जीविका का निर्वाह करना चाहिए- (वही, 10.99.)