अराजकता कैसे जायज है?
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III
क्षत्रिय उद्दंड होकर कभी भी वह जीवन-पद्धति न अपनाए जो (उससे) श्रेष् (अर्थात् ब्राह्मणों के लिए) निर्धारित है- (वही, 10.95.)
राजा को वैश्य को व्यापार करने, ब्याज पर धन देने, कृषि करने, पशु उधार देने और शूद्र को द्विज जातियों की सेवा करने का आदेश देना चाहिए- (वही, 8.410.)
राजा सावधानीपूर्वक वैश्यों और शूद्रों को अपना-अपना कर्तव्य (जो उनके लिए निर्धारित हैं) करने के लिए बाध्य करे, अगर ये दोनों जातियां अपने-अपने कर्म से विरत होती हैं, तब वे इस समस्त संसार को अस्त-व्यस्त कर डालेंगी- (वही, 8.418_)
IV
कोई भी राजा अंधे व्यक्ति को मूर्ख को, (अपंग को) जो लाठी के सहारे के बिना उठ-बैठ या चल न सकता हो, उस व्यक्ति को जिसने सत्तर वर्ष की आयु पूरी कर ली हो और जो श्रोत्रियों को आर्थिक सहायता देता है, कोई कर देने के लिए बाध्य नहीं करेगा- (मनु, 8.394.)
कोई भी राजा (अभाव से) कितना ही ग्रस्त क्यों न हो, फिर भी श्रोत्रियों पर कर न लगाए और उसके राज्य में निवास करने वाला कोई भी श्रोत्रियों भूख से न मरे- (वही, 7.133.)
राजा अपने राज्य में रहने वाले साधारण जनों से जो फुटकर वस्तुओं की
खरीद बिक्री से जीवन-निर्वाह करते हैं, कुछ धन वार्षिक देने को कहे जिसे कर कहा जाता है- (वही, 7.137.)
वह (राजा) यांत्रिकों और कारीगरों के साथ-साथ शूद्रों से भी जो शारीरिक श्रम कर जीवन-यापन करते हैं (अपने लिए) महीने में एक दिन काम करवाए- (वही, 8.138.)
ब्राह्मण के लिए मृत्यु-दंड के स्थान पर उसका सिर मुंडा देना निश्चित किया गया है, लेकिन अन्य जातियों के लोगों के लिए मृत्यु-दंड निश्चित किया गया है- (वही, 8.379.)
(राजा) किसी भी ब्राह्मण का वध न कराए चाहे उस ब्राह्मण ने सभी अपराध क्यों न किए हों, वह ऐसे (अपराधी को) अपने राज्य से निष्कासित कर