विदेश के समान उदाहरण
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यद्यपि महामहिम की जल सेना और थल सेना में अधिकांश लोग कैथोलिक थे, तब भी किसी भी व्यवस्था में उन्हें धार्मिक सुविधाएं आदि नहीं दी गई थीं, लेकिन यदि वे उन धार्मिक रीतियों का पालन करने से अस्वीकार कर देते जो राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त गिरजाघरों द्वारा निश्चित की गई थी, तब उन्हें भारी दंड और यातना दी जा सकती थी। सेना के नियम के खंड 1 में यह व्यवस्था थी कि यदि कोई सैनिक डिवाइन सर्विस और सर्मन के समय अनुपस्थित रहता है, तब पहली बार के अपराध स्वरूप उसके वेतन में से एक शिलिंग जब्त कर लिया जाएगा। अगर वह दूसरी बार या बार-बार अपराध करता है, तब हर बार एक शिलिंग जब्त करने के अतिरिक्त उसे जेल की सजा भी भुगतनी पड़ेगी। इस कानून की धारा 2 और 5 के तहत यह भी विधान किया गया कि अगर वह अपने से ज्येष् अधिकारी को किसी विधि-सम्मत आदेश की अवमानना करता है (और निश्चय ही अगर वह डिवाइन सर्विस और सर्मन के समय उपस्थित रहने के बारे में अपने ज्येष् अधिकारी के आदेश की अवमानना करता है) तब उसे मृत्यु-दंड या और कोई दंड, जैसा भी जनरल कोर्ट मार्शल द्वारा दिया जाए भुगतना पड़ेगा।
महामहिम के अन्य प्रयोजनों की भांति रोम के कैथोलिक ईसाइयों को राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त धर्म का समर्थन करना पड़ेगा। इस प्रकार उन्हें दो धर्मों की विधियों का पालन करना पड़ेगा। निश्चय ही वे इस संबंध में कोई उज्र नहीं करते थे, लेकिन वे यह अनुभव करते थे कि उनकी यह शिकायत उचित ही है कि उनके धर्म को वैसी मान्यता प्राप्त नहीं है, जैसी कि प्रोटेस्टेंट धर्मावलंबियों को प्राप्त है।
अस्पतालों व फैक्टरियों में और अन्य सार्वजनिक स्थानोंपर जब कैथोलिक पादरी रोटी और कुछ पेय बांटने आते हैं, तब गरीब कैथोलिक बच्चों को घुसने नहीं दिया जाता और रोम के गरीब कैथोलिक ईसाइयों के बच्चों को उनके माता-पिता के सामने कभी-कभी प्रोटेस्टेंट स्कूलों में जबरदस्ती डाल दिया जाता है। कैथोलिक ईसाइयों की तरह अस्पृश्यों को भी बहिष्कृत किए जाने की यंत्रणा भुगतनी पड़ती है।