विदेश के समान उदाहरण
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ही उपलब्ध थे। इस भू-भाग को जीतने के दौरान पुर्तगालियों और स्पेनवासियों ने अधिकांश इंडियन (स्थानीय) लोगों का संहार किया था। इन आक्रमणों से डरकर बहुत से इंडियन लोग भागकर पहाड़ों और जंगलों में जाकर छिप गए थे। जो भी उपलब्ध हुए, उन्हें गुलाम बना दिया गया और खानों में खुदाई के काम पर लगा दिया गया। पुर्तगालियों और स्पेनवासियों के कोड़ों की मार खाकर और उनसे
खानों और खेतों में जिस निर्दयता से अनथक काम लिया जाता था, उससे वहां के स्थानीय निवासी बीमार पड़ जाते और मर जाते थे।
दक्षिणी अमरीका के आरंभिक स्पेन के विजेता कनक्टिवजटेडर के नाम से जाने जाते थे। ये कनक्टिवजटेडर निकालेस दि ओवेडो के नेतृत्व में, जो कोलंबस के तुरंत बाद यहां आया था, अपने साथ बात्रोलोमे दि लस कसास नामक एक नवयुवक पादरी को ले आए। यह पादरी अपने पवित्र आचरण के लिए विख्यात था। लस कसास पर कोर्ट आफ स्पेन में यह आरोप लगाया गया कि वह इन इंडियन (स्थानीय) लोगों के साथ इस आशा से स्नेहपूर्ण व्यवहार करता था कि वह इनको पवित्र ईसाई धर्म में दीक्षित कर लेगा। लस कसास मेक्सिकों का प्रथम बिशप था। लस कसास ने अपने उस कर्तव्य का पालन करते हुए जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया था, हाईती में कनक्विजटेडरों द्वारा वहां के इंडियन निवासियों पर किए जाने वाले निर्दयतापूर्ण व्यवहार को अपनी आंखों से देखा था और जीवन-पर्यन्त हाईती के बचे-खुचे बेचारे इंडियनों की, जिन्हें कैरीबियन कहा जाता था, उनके मालिकों के हाथों नष् होने से रक्षा की। कैरीबियन लोग विनम्र सीधे-सादे और मिलनसार नस्ल के थे। जब कोलंबस ने उनका पता लगाया था तब उनकी संख्या 1,000,000 से कम नहीं थी। ये विभिन्न राज्यों में बंटे हुए थे। इन राज्यों में इनके प्रमुख, जिन्हें कैशीक कहा जाता था, शांतिपूर्वक राज्य करते थे। कोलंबस के बाद स्पेन के जो साहसी लोग यहां आए, उनके सुनियोजित अत्याचारों के कारण इनकी संख्या मुश्किल से 60,000 रह गई। यह कहा जाता है कि सभी गांवों के लोगों ने अन्य लोगों को भी आमंत्रित कर आत्महत्या कर ली, क्योंकि उनके द्वारा किए जा रहे नरसंहार और क्रूर अत्याचार का और कोई निदान नहीं था। लस कसास ने आत्मदाह की अनेक घटनाओं को स्वयं देखा था। लस कसास ने इन घटनाओं को लेकर क्षोभ व्यक्त किया। लेकिन उसका विरोध करना व्यर्थ था और उसके उस विरोध का निष्फल होना निश्चित था। जंगलों की सफाई, जमीन की जुताई और खानों की खुदाई तो होनी ही थी। इसके बिना ईश्वर-प्रदत्त राज्य मनुष्य के लिए स्वर्ग नहीं बन सकता था। लस कसास ने इसे अनुभव कर लिया थ। लेकिन उसे इस बात की बड़ी चिंता थी कि अगर यह सब कार्य होते हैं, तब