8. विदेश के तदनुरूप उदाहरण - Page 131

116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हुए थे और उन्हें गुलाम और मालिक होने, दोनों प्रकार का स्वयं अनुभव था। इसलिए जब किसी नीग्रो को जबरदस्ती मालिक से गुलाम बना दिया जाता और वह मालिक नहीं रह जाता था, तब किसी के हृदय में उसके प्रति वैसी ही सहानुभूति नहीं उत्पन्न होती थी। लेकिन अगर इसे अपने किए का उचित दंड भी मान लिया जाए तो भी उस नई दुनिया में जहां उसे लाकर रखा जा रहा है, गुलाम के रूप में उसकी स्थिति उन कषें के संदर्भ में जो उसे उसके नए और विदेशी मालिक देते थे, थोड़ा-बहुत क्रोध तो पैदा कर ही सकती थी।

नई दुनिया में जहां नीग्रो लोगों को गुलामी की प्रथा में ढाला जाने लगा, उन्हें कितने और किस प्रकार के कष् दिए जाते थे, यूरोप और एशिया के वासियों को उनकी कल्पना करना संभव नहीं। इन कषें का वर्णन इन्हें तीन शीर्षकों में बांटकर किया जा सकता- पकड़े जाते समय का कष्, यात्रा में दिया गया कष् और जब उनसे काम कराया जाता है तब दिया जाने वाला कष्। पहला कष् तो उस प्रक्रिया में होता था, जिस प्रक्रिया द्वारा गुलाम बनाने के लिए नीग्रो लोगों की धर-पकड़ की जाती थी। शुरू-शुरू में तट पर अचानक जहाज के पहुंचने पर उनकी धर-पकड़ की जाती थी। लेकिन बाद में नीग्रो जहाजों की टोह लेना और भागकर जंगलों व झाडि़यों में छिप जाना सीख गए। बाद में ये समुद्री व्यापारी भीतरी इलाके में कभी-कभी आ जाते और वे सामान्यतः स्थानीय व्यापारियों या छोटा-मोटा धंधा करने वालों के साथ धंधा करने लगे। वे यूरोप से सस्ता माल, जैसे कपड़ा, नकली मोती, लोहे से बना सामान, छोटी-बड़ी बंदूकें और कारतूस, शराब आदि लाते और उसके बदले उनसे गुलाम और उनके कबीले के मालिकों को खरीद लिया करते। इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलाता कि शक्तिशाली कबीले के सरदारों ने इस प्रकार के माल, खासतौर से बंदूकों या शराब के प्रति कभी अनाकर्षण प्रकट किया जो या ऐसी वस्तुओं के प्रति वे कभी आकृष् न हुए हों। यह देखा गया कि छोटे से छोटे अपराध पर भी लोगों को दंड स्वरूप गुलाम बना लिया जाता था, निजी स्वार्थ के लिए कबीलों के बीच परस्पर लड़ाइयां, शांति के समय औरतों और बच्चों का अपहरण अफ्रीकी जीवन का लगभग अभिन्न अंग बन गया और ज्यों-ज्यों भीतरी भू-भाग में व्यापार फेलने लगा, त्यों-त्यों इन घटनाओं का सिलसिला भी बढ़ता गया।

दूसरा कष् इन नीग्रो लोगों को तब भोगना पड़ता, जब वे अमरीका ले जाए जाते थे। इनके व्यापारी इनको खरीदने के बाद एक टोली में तट पर पैदल चलाते। इसमें आदमियों, औरतों व बच्चों का कोई ख्याल नहीं किया जाता था। कभी-कभी