8. विदेश के तदनुरूप उदाहरण - Page 133

118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘खराब’ ‘घटिया’ या बुरी तरह से घिसा-पीटा है। आखिर में जहांज पर या खुले बाजार में इन गुलामों को हर-एक का नाम बताकर या बोली लगाकर बेचा जाता था। 18वीं शताब्दी में एक हट्टे-कट्टे नीग्रो की कीमत बढ़कर 60 पौंड तक हो गई थी। बीमार और घायल नीग्रो लोगों को कमजोर नीग्रो स्त्रियों और बच्चों के साथ मिलाकर बचे-खुचे माल की तरह सस्ते दामों में बेच दिया जाता था। आखिर में जब ये नीग्रो खेतों तक पहुंचते, तब उन्हें शेष जीवन में लिखे भोग को भोगने के लिए तैयार होने से पहले एक और संकट से गुजरना पड़ता था। काम पर लगाए जाने पर पहले कुछ महीनों की अवधि पक्का होने की अवधि कही जाती थी, इस दौरान नए गुलामों में से औसतन एक तिहाई गुलाम शरीर और मन से नई जलवायु या खाना-पीना या परिश्रम में अपने को अनुकूल नहीं कर पाते और वे मर जाते थे। कुल-मिलाकर इस प्रकार मरने वालों की-अर्थात् जब इन गुलामों को पकड़ने के लिए लड़ाइयां लड़ीं जातीं या धावे मारे जाते थे, जब उन्हें समुद्र-तट तक पैदल चलाया जाता था, जब वह ‘मिडिल पैसेज’ से होकर जाते थे और जब उन्हें पक्का किया जाता था-संख्या के बारे में स्थूल रूप से यह अनुमान लगाया गया है कि हर-एक अफ्रीकी नीग्रो पर जब उसे पक्का कर दिया जाता था, एक नीग्रो की मृत्यु होती थी।

तीसरे प्रकार का कष् तब भोगना पड़ता था, जब पक्के बनाए गए नीग्रो को जीवन की वास्तविक परिस्थिति से जूझना पड़ता था। नीग्रो गुलामों की पद्धति में उसके मालिक को दो प्रकार के अधिकार मिले होते थे, जो निर्विवाद होते थे। ये अधिकार थे-स्वामित्व का अधिकार और दंड देने का अधिकार। स्वामित्व का अधिकार का बड़ा व्यापक अर्थ होता था। इस अधिकार के तहत मालिक को अपने नीग्रो गुलाम का सेवक के रूप में इस्तेमाल करने का ही अधिकार प्राप्त नहीं था, बल्कि वह उसे सेवा करने के लिए किसी दूसरे को बेच भी सकता था, वह पुश्तैनी आधार किसी दूसरे को दे सकता था। वह अपनी मर्जी के अनुसार जो चाहे कर सकता था। अधिकार की इस अवधारणा का आशय उस गुलाम के व्यक्तित्व के अधीन की गई संपत्ति के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित करना था। संपत्ति के रूप में गुलाम की अवधारणा के कारण वह मालिकों द्वारा अपने कर्ज चुकाने की स्थिति में देय या अधिकृत किए जाने योग्य हो गया। अगर इस प्रकार गुलाम मुक्त भी हो जाए, तो भी वह अपनी मुक्ति के पहले अपने मालिक के द्वारा लिए गए ऋण को चुकाने के लिए इस्तेमाल हो सकता था। गुलामों के व्यक्ति के बजाय संपत्ति के रूप में स्वीकार हो जाने पर उनकी कानूनी और नागरिक के रूप में स्थिति और भी सीमित हो गई। वह स्वं कोई संपत्ति न रख सकता था,