8. विदेश के तदनुरूप उदाहरण - Page 134

विदेश के समान उदाहरण

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और न उसका कोई उपयोग ही कर सकता था। यह रोम के कानून के अनुसार नहीं था, जहां गुलामों को अपनी संपत्ति बनाने व रखने का अधिकार था। इसे उसकी निजी संपत्ति (पिक्यूलियन) कहते थे। हालांकि यह सीमित अधिकार था, तो भी यह महत्वपूर्ण अधिकार होता था, क्योंकि यह इस तथ्य को प्रमाणित करता था कि रोम का कानून यह स्वीकार करता था कि संपत्ति होते हुए भी गुलाम का अपना व्यक्तित्व है। चूंकि नीग्रो का गुलाम के रूप में कोई व्यक्तित्व नहीं है, इसलिए वह न तो व्यापार, और न ही अपना विवाह कर सकता था। मालिक द्वारा गुलाम को दंड दिए जाने के अधिकार की व्याख्या नीग्रो के प्रसंग में बड़े क्रूर होकर की जाती थी। 1829 में नार्थ कैरोलीन राज्य के न्यायालय में एक मामले में मुख्य न्यायाधीश ने एक मालिक को जिस पर अपने गुलाम को पीटने का आरोप था, बरी करते हुए यह व्याख्या कीः

यह कहना गलत है कि मालिक और गुलाम के बीच के संबंध माता-पिता

और उनकी संतान के बीच के संबंध जैसे होते हैं। जब माता-पिता अपने पुत्र

को कुछ सिखाते हैं, तब उनका उद्देश्य उसे इस योग्य बनाना होता है कि

वह एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में अपना जीवन-यापन कर सके, और इसी

उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे उसे नैतिक और बौद्धिक सीख देते हैं। गुलामों के

संबंध में स्थिति भिन्न होती है। गुलाम को नैतिक सीख देने का तो अर्थ ही

नहीं है। गुलामों की व्यवस्था का उद्देश्य मालिक को लाभ और उसकी सुरक्षा

होता है, उसके गुलामों का इससे भिन्न कोई अस्तित्व नहीं होता, उनमें अपने

लिए कुछ करने का कोई सामर्थ्य नहीं होता, वे परिश्रम ही करते हैं, लेकिन

उसका फल न तो उनको मिलता है, और न उनकी संतान को। ऐसे लोगों को

क्या नैतिक सीख दी जा सकती है, जिससे उन्हें यह आश्वस्त किया जा सके

कि उन्हें सहज भाव से या केवल अपने सुख के लिए परिश्रम करते रहना

है, क्योंकि यह असंभव है और शायद ही कोई मूर्ख इसे अनुभव या स्वीकार

करेगा, यह कभी सच नहीं हो सकता? ऐसी सेवाएं उसी से अपेक्षित हो सकती

हैं, जिसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती, जो अपनी इच्छाओं को दूसरों की

इच्छाओं की पूर्ति में समर्पित कर देता है। ऐसा अनुपालन तभी संभव है, जब

शरीर और मन के ऊपर किसी का पूर्ण अधिकार हो। इसके बिना अपेक्षित

फल की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए मालिक को परम अधिकार होना

चाहिए, जिससे गुलाम उसके प्रति पूर्ण समर्पित रहे।

दंड देने के बारे में मालिक के अधिकार की इस प्रकार की व्याख्या का