विदेश के समान उदाहरण
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गले में लोहे के छिल्ले और पैरों में लोहे के बूट पहने शहर की सड़कों पर
अक्सर ये दिखाई पड़ जाते हैं ‘स्पर’ लोहे के छल्ले होते हैं, जो बूट जैसे ही
होते हैं। इनमें तीन से चार इंच तक लंबी नुकीली छड़ें लगा दी जाती हैं और
इन्हें आड़ा करके रखा जाता है। शरीर के चारों ओर सांकल पहना कर उसे
ताले से जकड़ देना इन दलित प्राणियों को सताने का एक और तरीका है।
इन गुलामों के सभी मालिकों को एक की गलती के कारण एक जैसा समझना भयंकर गलती होगी। मालिकों के प्रति गुलामों का अक्सर दोस्ताना रवैया होता और इसी तरह गुलामों के प्रति मालिकों का रवैया भी कृपापूर्ण होता। जो भी हो, यह व्यवस्था पूर्णतः आर्थिक आधार पर आश्रित थी, जिसके कारण यह समझा जाता था कि मनुष्य का सृजन भी एक साधन के रूप में हुआ है और उसका इस्तेमाल मनुष्यता का ख्याल किए बिना किया जा सकता है।
इस बात को पुष् करने के लिए और अधिक उदाहरण देने की अब आवश्यकता नहीं है कि अतीत में भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी निम्न, पराधीन और अधिकार-विहीन वर्ग होते थे। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि पृथक वर्ग के रूप में यह पराधीन और अधिकार-विहीन वर्ग लुप्त हो गए और समाज का अभिन्न अंग बन गए। प्रश्न है, अस्पृश्यता क्यों कर नहीं लुप्त हुई?
इसके अनेक कारण है। इन पर अगले अध्यायों में चर्चा की जाएगी।