9. हिंदू और सार्वजनिक विवेक का अभाव - Page 137

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हिंदू और सार्वजनिक विवेक का अभाव

जिन परिस्थितियों में हिंदुओं ने अस्पृश्यों के विरुद्ध हिंसा तक का सहारा लिया है, वे परिस्थितियां सभी को समान स्वतंत्रता की चाहत की रही हैं। अगर अस्पृश्य अपना जुलूस निकालना चाहते हैं, तब उन्हें हिंदुओं के द्वारा जुलूस निकालने पर कोई एतराज नहीं होता। अगर अस्पृश्य सोने और चांदी के जेवर पहनना चाहते हैं, तब हिंदुओं को भी वैसा ही अधिकार रहे, इस पर वे कोई एतराज नहीं करते। अगर अस्पृश्य अपने बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना चाहते हैं, तब वे हिंदुओं के बच्चों को शिक्षा की पूरी आजादी होने का विरोध नहीं करते। अगर अस्पृश्य कुएं से पानी भरना चाहते हें, तब हिंदुओं के द्वारा पानी भरने के अपने अधिकार का उपयोग किए जाने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती। इन सबका कोई अंत नहीं। यहां इन्हें गिनाने की जरूरत नहीं है। सीधी-सी बात है। वह यह है कि अस्पृश्य जो स्वतंत्रता चाहते हैं, वह सिर्फ अपने लिए नहीं है, और वह हिंदुओं के समान स्वतंत्रता के अधिकार से भिन्न नहीं है। तब हिंदू ऐसी इच्छाओं को जो किसी को हानि नहीं पहुंचाती और जो पूर्णतः न्यायसंगत हैं, अमल में न आने देने के लिए हिंसा पर क्यों उतर आते हैं? हिंदू अपने अन्याय को न्यायसंगत क्यों मानते हैं, कौन यह इंकार कर सकता है कि अस्पृश्यों के साथ हिंदुओं के व्यवहार में जो कुछ अपकर्म होता है, उसे सामाजिक अपराध के अतिरिक्त और कोई संज्ञा नहीं दी जा सकती। यह केवल अन्याय नहीं है, यह केवल तिरस्कार नहीं है। यह मनुष्य की मनुष्य के प्रति घोर अमानवीयता है। अगर किसी डाक्टर के द्वारा मरीज का इसलिए इलाज न करना कि मरीज अस्पृश्य है, अगर हिंदुओं के एक गिरोह द्वारा अस्पृश्यों के घरों को जला डालना, अगर अस्पृश्यों के कुओं में मैला डलवा देना अमानवीय कार्य नहीं है, तब मैं सोचता हूं कि यह और क्या है? प्रश्न यह है कि हिंदुओं में विवक क्यों नहीं है?