हिंदू और सार्वजनिक विवेक का अभाव
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इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है। अन्य देशों में वर्ग आर्थिक और सामाजिक दृषि् के आधार पर बने। गुलामों और खेतिहर गुलामों की धर्म में कोई व्यवस्था नहीं थी। इसकी अपेक्षा अस्पृश्यता मुख्यतः धर्म पर आधारित है, हालांकि इससे हिंदुओं को आर्थिक लाभ होता है। जब कभी आर्थिक या सामाजिक हित की बात होती है, तब कुछ भी पवित्र या अपवित्र नहीं होता। ये हित समय और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। गुलाम-प्रथा और खेतिहर गुलाम-प्रथा क्यों कर मिट गई और अस्पृश्यता क्यों कर नहीं मिटी, इसका यही स्पष् कारण है। दो अन्य प्रश्नों का भी यही उत्तर है। अगर हिंदू अस्पृश्यता का पालन करता है, तो यह इसलिए कि उसका धर्म उसे ऐसा करने का आदेश देता है। अगर उसकी इस स्थापित व्यवस्था के विरुद्ध उठने वाले अस्पृश्यों का वह नृशंसतापूर्वक और अन्यायपूर्वक दमन करता है, तब उसका कारण उसका अपना धर्म है, जो उसे केवल इस बात की ही शिक्षा नहीं देता कि यह स्थापित व्यवस्था दैवी विधान है और इसलिए पावन है, बल्कि उस पर यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य भी आरोपित करता है कि उसे इस स्थापित व्यवस्था का हर संभव उपाय से कायम रखना है। अगर वह मानवता की पुकार को नहीं सुनता, तब उसका कारण यह है कि उसका र्ध्म अस्पृश्यों को मानव समझने के लिए उसे बाध्य नहीं करता। अगर अस्प्ृश्यों को मारने-पीटने उनके घरों को लूटने तथा जलाने और उन पर अत्याचार करते समय उसे अपने विवके का कुछ भी ध्यान नहीं रहता, तब उसका कारण यह है कि उसका धर्म उसे इस बात की शिक्षा देता है कि इस सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा करने के लिए किया गया कोई भी कर्म पाप-कर्म नहीं है।
अधिकांश हिंदू कह सकते हैं कि ऐसा कहना तो उनके धर्म की हंसी उड़ाना है। इस आरोप का उत्तर देने का सबसे अच्छा उपाय हिंदू समाज के निर्माता मनु के कथन, जो उसके ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ के अध्यायों व श्लोकों में दिए गए हैं, उद्धत करना है। मैंने जो कुछ कहा है, उसका अगर कोई खंडन करता है तो उसे अस्पृश्यता के विषय में मनु की निम्नलिखित व्यवस्थाओं को पढ़ना चाहिएः
- इस पृथ्वी पर जो भी जातियां उस समुदाय से अलग रखी गई हैं जो
मुख, बाहु, जंघा और (ब्राह्मण के) पैरों से जन्मी हैं, वे दस्यु कहलाती
हैं, जो चाहे म्लेच्छों (बर्बर जातियों) की भाषा बोलती हों या आर्यों की
-(मनु 10.45.)
- ये जातियां प्रसिद्ध वृक्षों और श्मशान भूमि के निकट या पर्वतों पर और
झाडि़यों के पास निवास करें, (कुछ चिह्नों से) जानी जाएं और अपने