हिंदू और सार्वजनिक विवेक का अभाव
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उनके मन में न्यायरहितता और विवेकशून्यता उत्पन्न करने के लिए धर्म एकमात्र कारण नहीं है? निश्चय ही, अगर इन दस व्यवस्थाओं के साथ अपकर्मों को जोड़ दिया जाए, जिनका ब्यौरा इस पुस्तक के आरंभिक अध्यायों में दिया जा चुका है, तब यह स्पष् हो जाएगा कि अस्पृश्यों के साथ हिंदू जो बर्ताब करते हैं, वह ऐसा कर मनु की व्यवस्थाओं का ही पालन करते हैं। अगर हिंदू किसी अस्पृश्य का स्पर्श नहीं करता है और अगर वह किसी अस्पृश्य द्वारा स्पर्श कर लिया जाने पर इसे उसका अपराध मानता है, तब वह ऐसा उपर्युक्त पांचवी और दसवीं व्यवस्था के कारण करता है। अगर हिंदू अस्पृश्यों के पृथक रहने पर जोर देता है, तब वह ऐसा तीसरी व्यवस्था के कारण करता है। अगर हिंदू अस्पृश्य को साफ कपड़े और सोने के जेवर नहीं पहनने देता, तब वह आठवीं व्यवस्था का ही तो पालन करता है। अगर हिंदू किसी अस्पृश्य द्वारा संपत्ति और धन अर्जित किया जाना सहन नहीं कर सकता, तब वह तीसरी व्यवस्था का पलन करता है।
वस्तुतः इस बारे में और अधिक तूल देने की कोई आवाश्यकता नहीं। यह निर्विवाद है कि अस्पृश्यों के दुर्भाग्य का मुख्य कारण हिंदू धर्म और उसकी शिक्षाएं हैं। जहां तक गुलाम-प्रथा का संबंध गैर-ईसाई धर्म व ईसाई धर्म से और अस्पृश्यता का संबंध हिंदू धर्म से है, इन दोनों के बीच तुलना करने से यह पता चल जाएगा कि इन दोनों धर्मों का मानव संस्थाओं पर कितना भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ा है। अगर पहले धर्म से मानव समाज का उत्थान हुआ है, तो हिंदू धर्म के कारण मानव समाज का कितना अधिक पतन हुआ है। जो लोग अक्सर गुलाम-प्रथा के साथ अस्पृश्यता की तुलना करते हैं, वे यह नहीं सोचते कि वे विरोधी स्थितियों की परस्पर तुलना कर रहे हैं। कानून के अनुसार गुलाम स्वतंत्र व्यक्ति नहीं था, तो भी सामाजिक दृषि् से उसे वह सारी स्वतंत्रता प्राप्त थी, जो उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक थी। इसकी अपेक्षा एक अस्पृश्य व्यक्ति कानून के अनुसार स्वतंत्र व्यक्ति तो है, फिर भी सामाजिक तौर पर उसे अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए कोई भी स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है।
यह निश्चय ही एक ऐसी विरोधपूर्ण स्थिति है, जो साफ नजर आती है। इस विरोधपूर्ण स्थिति का क्या कारण है? इसका एक ही कारण है, और वह यह है कि वहां धर्म गुलामों के पक्ष मेंं था, जब कि यहां यह अस्पृश्यों के विपक्ष में है। रोम के कानून में यह घोषित किया गया कि गुलाम की कोई व्यक्तित्व सत्ता नहीं है। लेकिन रोम के धर्म ने इस सिद्धांत को कभी भी स्वीकार नहीं किया और उस सिद्धांत को किसी भी हालत में सामाजिक क्षेत्र में लागू करना स्वीकार नहीं किया।