126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उसने गुलाम को मित्र होने योग्य समझकर उसके साथ मानवोचित व्यवहार किया। हिंदू कानून में यह घोषित किया गया कि अस्पृश्य का कोई व्यक्तित्व नहीं है। गैर-ईसाई धर्म के विपरीत, हिंदू धर्म ने इस सिद्धांत को स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उसे सामाजिक क्षेत्र में लागू भी कर दिया। चूंकि हिंदू कानून ने अस्पृश्य का कोई व्यक्तित्व स्वीकार नहीं किया, इसलिए हिंदू धर्म ने उसे मानव नहीं माना कि वह मित्रता के योग्य हो सकता।
इसका कोई प्रश्न ही नहीं होता कि कानूनी तौर पर निचला दर्जा दिए जाने पर रोम के धर्म ने गुलाम की सामाजिक अवनति से रक्षा नहीं की। उसने इस अवनति से उसकी रक्षा तीन भिन्न-भिन्न रीतियों से की। रोम के धर्म ने उसकी रक्षा जिन तीन रीतियों से की, उनमें एक तो यह थी कि रोम के धर्म ने अपने यहां गुलाम को पवित्रतम पद पर प्रतिष्ति होने के लिए अपने सभी दरवाजे खुले रखे। जैसा कि कहा गया हैः
रोम का धर्म कभी भी गुलामों के विरुद्ध नहीं रहा। उसने अपने पूजास्थलों
के द्वार उनके लिए कभी भी बंद नहीं किए। उसने उन्हें अपने उत्सवों में भाग
लेने से कभी नहीं रोका। यदि कुछ अनुषनों में सम्मिलित होने पर गुलामों
पर प्रतिबंध था, तो वैसा ही प्रतिबंध मुक्त गुलामों (पुरुष और स्त्रियों) पर
भी था- पुरुषों पर बोना दिया, वेस्ता और केरस अनुषन में सम्मिलित होने
पर प्रतिबंध था, तो एरा मैक्सिमा में हरक्यूलिस नामक अनुषन स्त्रियों के
लिए वर्जित था। जब रोम के निवासी अपने प्राचीन देवताओं से अपने लिए
आशीर्वाद मांगा करते थे, तब वे अपने गुलामों को भी अनौपचारिक रूप से
अपने परिवार के अंग के रूप में सम्मिलित कर लेते थे और वे अपने को
उस परिवार के देवी-देवताओं के संरक्षण में आया समझते थे। आगस्टन ने
यह आदेश दिया कि मुक्त की हुई गुलाम स्त्रियों को बेस्ता में पादरिन बनने
योग्य समझा जाना चाहिए। कानून इस बात पर बल देता था कि गुलाम की
कब्र को पवित्र स्थल माना जाए और रोम की धार्मिक कथाओं में उसकी
आत्मा के लिए अलग से किसी विशेष स्वर्ग या नरक का प्रावधान नहीं
किया गया। जुनेरल यह स्वीकार करता है कि गुलाम का शरीर और उसकी
आत्मा उन्हीं तत्वों से बनी है, जिनसे उसके मालिक का शरीर और आत्मा
बनी है।
रोम के धर्म ने गुलामों की जिस दूसरी रीति से सहायता की वह यह कि उसने गुलामों को नगर प्रमुख (सिटी प्रीफेक्ट) के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज करने के