9. हिंदू और सार्वजनिक विवेक का अभाव - Page 142

हिंदू और सार्वजनिक विवेक का अभाव

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योग्य समझा, जिसका काम गुलामों पर उनके मालिकों के द्वारा किए जाने वाले अत्याचार के मामलों की सुनवाई करना हो गया। वह धर्मनिरपेक्ष उपाय था। एक और बढि़या उपचार रोम के धर्म ने यह किया कि गुलाम पूजा-गृह में जाकर यह निवेदन कर सकता था कि उसे किसी अधिक दयालु मालिक के हाथ बेच दिया जाए।

रोम के धर्म ने जिस तीसरी रीति से गुलामों की रक्षा की वह यह थी कि उसने रोम के कानून को उसके मानव होने के औचित्य को नष् करने नहीं दिया। उसने उसे मानव समाज और मानव मैत्री के अयोग्य नहीं घोषित किया। रोम के गुलामों के लिए यह एक बड़ी नजात थी। कल्पना कीजिए कि यदि रोम का समाज गुलामों के हाथ से सब्जी दूध और मक्खन न खरीदता, उनके हाथ का छुआ पानी या शराब न पीता कल्पना कीजिए कि यदि रोम का समाज गुलामों से छूतछात बरतता, उन्हें अपने घरों में न घुसने देता वाहनों में उन्हें साथ न बैठाता आदि तो क्या उनके मालिकों के लिए यह संभव होता कि वे उन्हें अर्ध जंगली स्थिति से ऊपर उठाकर सभ्य बना लेते। स्पष्तः कदापि नहीं। कारण यही था कि गुलाम को अस्पृश्य बनाकर नहीं रखा गया, इसलिए मालिक ने प्रशिक्षित करके उसे ऊंचा उठाया। हम फिर उसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, अर्थात् गुलाम को इसलिए बचाया जा सका क्योंकि समाज द्वारा उसके व्यक्तित्व को मान्यता दी गई और अस्पृश्य की बरबादी का कारण यही था कि हिंदू समाज ने उसके व्यक्तित्व को मान्यता नहीं दी। उसे गंदा और गलीज माना, जिसके कारण वह बराबर में बिठाए जाने या व्यवहार रखे जाने योग्य नहीं रहा।

कोई सामाजिक या धार्मिक खाई नहीं थी, जो गुलाम को शेष समाज से अलग रखती। बाहर से देखने-सुनने में वह मुक्त गुलाम (फ्रीमैन) से भिन्न नहीं था। रंग या कपड़ों से उसकी स्थिति का पता नहीं चलता था, वह मुक्त गुलाम की तरह सभी खेल-तमाशों को देख सकता था, वह नगर के जन-जीवन में भाग ले सकता था और राज्य की नौकरियों में नियुक्त हो सकता था, वह व्यापार और वाणिज्य में भाग ले सकता था, जैसे कि अन्य मुक्त गुलाम भाग लेते थे। अक्सर देखा गया कि व्यक्ति के लिए बाहर-बाहर दिखने वाली प्रातिभासिक समानता का महत्व उन अधिकारों से अधिक होता है, जो उसे कानून के तहत प्राप्त होते हैं। गुलाम और मुक्त गुलाम के बीच सामाजिक सीमा अक्सर मिट जाती होगी। गुलाम और मुक्त गुलाम तथा मुक्त गुलाम और गुलाम के बीच विवाह-संबंध आम बात थी। गुलाम होने की स्थिति उस व्यक्ति के लिए कलंक नहीं रह गई, जो गुलाम होता था। वह