128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
स्पृश्य था और आदरणीय भी। यह सब गुलामों के प्रति रोम के धर्म के दृष्किण के कारण हुआ।
गुलाम-प्रथा के संबंध में ईसाई धर्म के रवैये के विषय में विस्तार से लिखने के लिए यहां स्थान नहीं है। परंतु वह गैर-ईसाई धर्म से भिन्न था। बहुत से लोगों को इस बात का पता नहीं है कि अमरीका में गुलाम-प्रथा के दिनों में ईसाई पादरी किसी गुलाम को ईसाई धर्म में दीक्षित करने के लिए तैयार नहीं होते थे, क्योंकि उनका विचार था कि यदि गुलामों को दीक्षित किया गया और वे गुलाम ही बन रहे, तो इससे ईसाई धर्म का स्तर गिर जाएगा। उनका विचार था कि कोई ईसाई दूसरे ईसाई को गुलाम बनाकर नहीं रख सकता। उसे दूसरे ईसाई को बराबरी का दर्जा देना पड़ जाएगा।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कानून और धर्म, दो ऐसे तत्व हैं जो व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। कभी-कभी तो उनका चोली-दामन का साथ होता है और कभी-कभी वे एक-दूसरे की खामियों को सुधारने का काम भी करते हैं। इन दोनों तत्वों में कानून का संबंध व्यक्ति से है, जब कि धर्म निवैयक्तिक होता है। कानून क्योंकि व्यक्ति पर आधारित है, इसलिए वह अन्याय और असमानता का कारण हो सकता है। परंतु धर्म के साथ यह बात नहीं है, इसलिए वह निष्पक्ष रह सकता है। यदि धर्म निष्पक्ष होगा, तो वह कानूनी असमानता को दूर करने की क्षमता रखता है। रोम में गुलामों के संबंध में ऐसा ही हुआ। इसी कारण र्ध्म के विषय में यह कहा जाता है कि वह मनुष्य को उदात्त बनाने के लिए है, न कि उसें अवनत करने के लिए। हिंदू धर्म एक अपवाद है। इसने अस्पृश्यों को अधः प्राणी बना दिया। इसने हिंदू को अमानुषिक बना दिया। इस अधः प्राणी की स्थापित व्यवस्था से और न अमानुषिकता से ही त्राण पाने का कोई उपाय दीखता है।